अचिन्त साहित्य “दीपावली क्षणिका विशेषांक”:एक विशाल क्षणिका संग्रह –दीपोत्सव मुबारक हो!

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अचिन्त साहित्य दीपावली क्षणिका विशेषांक  

चयन एवं सम्पादन : डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर’
प्रबंधन एवं प्रकाशन : डॉ. पूर्णिमा राय

आयोजन :
अचिन्त साहित्य (वेबसाइट)
क्षणिकाकार (फ़ेसबुक एवं ह्वाट्सऐप समूह)

www.achintsahitya.com
(बेहतर से बेहतरीन की ओर बढ़ते कदम)

दीपावली क्षणिका विशेषांक : विषय सूची
👇
————————————–
00- सम्पादकीय : डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर’
01- डॉ. मिथिलेश दीक्षित 
02- चक्रधर शुक्ल
03- डॉ. उमेश महादोषी
04- प्रकाश प्रलय 
05- डॉ. शंकर क्षेम
06- शिव डोयले
07- डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर’
08- दिनेश रस्तोगी 
09- डॉ भावना तिवारी 
10- डॉ. वेद प्रकाश ‘अंकुर’
11- डॉ. रमा द्विवेदी 
12- चन्द्रप्रकाश पांडे 
13- डॉ. सुरेन्द्र वर्मा
14- डॉ. आनन्द प्रकाश शाक्य 
15- केशव शरण 
16- डॉ. रंजना वर्मा 
17- पुष्पा सिंघी
18- डॉ. पूर्णिमा राय 
19- डॉ. बीना रानी गुप्ता 
20- ऋता शेखर ‘मधु’
21- संदीप सरस
22- देवीचरण कश्यप ‘अक्स’
23- त्रिलोचना कौर
24- गौरव वाजपेयी ‘स्वप्निल’ 
25- अरुण सिंह रुहेला 
26- प्रिंस मंडावरा
27- डॉ. ज्ञानेन्द्र गौरव
28- चंचला इंचुलकर सोनी
29- बृजेश अग्निहोत्री ‘पेण्टर’
30- डॉ. शशि शर्मा ‘शशि’
31- दिनेश गुप्ता
32- महेंद्र कुमार वर्मा 
33- आशा सक्सेना
34- ज्योतिर्मयी पन्त 
35- विनोद सागर
36- बालिका सेनगुप्ता 
37- अनिल मानव
38- पीयूष द्विवेदी ‘पूतू’
39- मंजु गुप्ता 
40- अनीला बत्रा 
41- डॉ. उम्मेदसिंह बैद
42- रेणु चन्द्रा माथुर 
43- राम कुमार सुरत
44- संतोष बैद
45- रूबी प्रसाद 
46- निधि कुनवर्णी
47- रेनू सिंह 
48- रीता कुमारी 
49- मधु छाबड़ा ‘महक’
50- सपना बाजपेयी 
51- संगीता पाठक 
52- डॉ. रूपेन्द्र कवि
53- आभा सिंह 
54- मीनाक्षी मेहरा
55- विनीत कश्यप 
56- डॉ. सोनिया गुप्ता 
57- नीरजा मेहता
58- केकी कृष्णा 
59- वी. पी. ठाकुर
60- राजन लिब्रा ‘राज’
61- पंकज टेम्भरे ‘कुमार’
**********

सम्पादकीय : डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर’
———👇

“एक विशेष उपलब्धि है दीपावली क्षणिका विशेषांक”

वर्तमान में क्षणिका विधा ने साहित्य में बहुत तेज़ी से पैठ बनायी है। दुनिया की अनेक भाषाओं में यह क्षणिका (सूक्ष्मकविता या माइक्रोपोयट्री) लोकप्रियता के मानक स्थापित कर रही है।
वर्तमान में परिवर्तन की गति बहुत तीव्र है और परिवर्तन की यह प्रक्रिया जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में है। साहित्य भी इससे अछूता नहीं है। मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि बदलते परिवेश में मानव के पास समयाभाव हुआ है और यान्त्रिकता के बाहुपाश में समाए मनुष्य के पास अब इतनी फ़ुर्सत नहीं है कि वह साहित्य को अधिक समय दे सके। ऐसे में निश्चित रुप से साहित्यकारों को ही अधिक प्रयास करने होंगे। कम शब्दों में अधिक अभिव्यक्ति भरनी पड़ेगी। ऐसे में यह युग लघुकविता या सूक्ष्मकविता का अधिक है। यही कारण है कि वर्तमान में काव्य में क्षणिका, हाइकु, दोहे तथा मुक्तक आदि अधिक लोकप्रिय हो रहे हैं तो गद्य में लघुकथा।

यह क्षणिका विशेषांक प्रस्तुत करते हुए अपार प्रसन्नता हो रही है। हमारे साथी क्षणिकाकारों ने दुनिया के महान पर्व दीपावली पर ‘अचिन्त साहित्य’ की इस विशेष प्रस्तुति में हमारा भरपूर साथ दिया। इस क्रम में फ़ेसबुक में संचालित ‘क्षणिकाकार’ समूह (https://www.facebook.com/groups/210569385950912/) ने इस कार्य को निरन्तर गति प्रदान की। बहुत कम समय में क्षणिकाकारों की सकारात्मक सक्रियता एवं उत्साह ने असम्भव को सम्भव बना दिया। हमें देश भर से अस्सी से अधिक क्षणिकाकारों की क्षणिकाएँ प्राप्त हुईं, जिनमें से सत्रह राज्यों के इकसठ क्षणिकाकारों की दो सौ सत्तर चयनित क्षणिकाएँ प्रस्तुत हैं। वरिष्ठ एवं ख्यातिलब्ध क्षणिकाकारों के साथ-साथ कई क्षणिकाकार पहली बार बतौर क्षणिकाकार सामने आए हैं और भविष्य के प्रति बहुत अधिक संभावनाशील हैं। यह हमारे लिए किसी उपलब्धि से कम नहीं है। प्रोत्साहन इनकी प्रतिभा को समय के साथ और अधिक निखारेगी। निकट भविष्य में हमारा प्रयास होगा कि इस विशेषांक को मुद्रित रूप में पुस्तकाकार भी किया जा सके। सभी क्षणिकाकारों को रचनात्मक सहयोग के लिए हार्दिक आभार। महत्वपूर्ण सुझावों के लिए वरिष्ठ क्षणिकाकार डॉ. मिथिलेश दीक्षित जी, अग्रज चक्रधर शुक्ल जी तथा डॉ भावना तिवारी जी का भी बहुत आभार! अन्त में अचिन्त साहित्य वेबसाइट की प्रकाशक एवं प्रबंधक डॉ. पूर्णिमा राय जी का भी बहुत आभार, जिनकी सक्रियता एवं जीवटता से समय पर यह कार्य सम्पन्न हो सका। पाठकीय प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा में-
दीपावली की अनन्त शुभकामनाओं के साथ-

– डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर’
(सम्पादक)
अध्यक्ष- अन्वेषी संस्था
फतेहपुर (उत्तर प्रदेश)
doctor_shailesh@rediffmail.com
**********

दीपावली क्षणिका विशेषांक 
👇

# डॉ. मिथिलेश दीक्षित 
लखनऊ (उत्तर प्रदेश)

1-
आस बढ़ने लग गयी
लाल मेरा आयेगा दीपावली में,
बुझती जीवन ज्योति
जलने लग गयी!

2-
आज तक हमने लिया क्या
और हमने क्या दिया,
देखने को रख गया था कोई
देहरी पर दिया!

3-
मेरा माटी का दिया
दूसरों को रोशनी देने को
जल-जल कर जिया!

4-
आ गयी दीपावली
दिल मत दुखाइए,
घी नहीं, पानी सही,
पानी नहीं, आँसू सही,
पर दीपक जलाइए!

5-
जितना भी माँगा गया
उसने उजाला कर दिया,
टूट कर फिर जुड़ न पाया
नन्हाँ माटी का दिया!

6-
ज्योति तुम्हारी
जली अनवरत्
मन के मन्दिर में,
यह दीपक
आँधी-तूफानों में भी
जलता रहा सदा!

7-
खील औ’ खिलौनों के
बढ़ गये दाम,
दीयों की तराजू बना
बेच रहे श्याम!

8-
जला दो दीया एक
नन्हाँ भले ही,
अँधेरों से लड़ने की
हिम्मत तो आये!

9-
अँधेरे में भी जो
दिखायी दिया है,
दिया रोशनी का
न बुझने दिया है!

10-
क्षीण होती जा रही थी
तैल-रूपी चेतना,
वर्तिका जलती रही और
नाम दीपक का हुआ!
**********

# चक्रधर शुक्ल 
कानपुर (उत्तर प्रदेश)

1-
अबकी बार
माटी के दिए
ख़ूब बिके,
देशवासियों ने
चाइनीज़ दिये
नहीं लिये!

2-
आप भी
गेह में
नेह के
दिये जलाएँ,
दीपावली
माँ-बाप के साथ मनाएँ!

3-
आतिशबाज़ी में
प्रदूषण का ग्राफ़ बढ़ा,
दिल के रोगियों को बेचैनी
हाइपरटेंशन वालों का
पारा चढ़ा!

4-
बड़ों के पैर छुएँ
छोटों को गले लगाएँ
माँ कहती है-
दीप-पर्व पर
दीपक का तेल लगाएँ,
काजल बनाएँ!

5-
मंगल-कलश के साथ
घी के दिये
गृह-मन्दिर में जलाएँ,
ज्योतित-ख़ुशियों का पर्व है
हँसे-मुस्कुराएँ!

6-
बाज़ारों में
चहल-पहल
सजी-धजी दुकानों को देखकर
दुखिया का मन
नहीं रहा बहल!

7-
दीपावली में
पुताईवाला
भाव खाये,
एक दिन छोड़कर
घर तने आये
ख़ूब कमाये!

8-
एक दीपक
घर में
एक दीपक
फ़्लैट में
एक दीपक
झोपड़ी में जलाएँ,
त्यौहार सबका है-
मिलकर मनाएँ!

9-
घर की सफ़ाई
करने के बाद
वो ज़ेबों की सफ़ाई कर रहे,
जुएँ में
सब कुछ धर रहे!

10-
आतिशबाज़ी से
नीलगगन
इन्द्रधनुषी हो गया,
दीप जल उठे
दीप-पर्व हो गया!
**********

# डॉ. उमेश महादोषी
बरेली (उत्तर प्रदेश)

1-
धुएँ का विष
साँसों में भर रहा है,
संकल्प है मगर
जीवन का एक दीपक
फिर भी
जल रहा है!

2-
ये लड़ियों के
सहोदर दिये हैं
इनकी लौ में
अजनबी साया है,
गाँव के पास से
गुजरती नदी के जल में
एक प्रतिबिम्ब छाया है!

3-
उखट गईं
सब रिश्तों की जड़ें
विचारों के प्लावन में,
इस दीवाली
गले मिलूँगा
बस अपनी परछाईं से!

4-
जलती प्लास्टिक की बूँदें
गिरती हैं
बदन पर,
अपनी अँतड़ियों को
घुटनों में छुपाये
धर रहा है कुम्हार
मलहम के फाहे!

5.
बहुत
उदास है दीवाली
पराई रौशनी में नहाई है
जी मचलता है
उसे अपनों की
याद आई है!

6-
प्रकाश तो बहाना था
रिश्तों के उल्लास का
अब रिश्ते तरसते हैं
प्रकाश की झलक को
दीपावली आती है
और
चली जाती है!

7-
हवा कराहती है
आकाश रोता है
दीपक
दोनों के
आँसू ढोता है,
प्रकाश के आँगन में
अब
ऐसा ही होता है!

8-
हाथों में फुलझड़ियाँ
और सामने
दीवारों पर
प्लास्टिक की विद्युतलड़ियाँ,
निकल गया मध्य से
सूँ…ऽ..ऽ…ऽऽ
एक रॉकेट
करता हुआ आखेट!

9-
गन्ध-सुगन्ध है
रोशनी है
रंग है
यत्र-तत्र खनक है
मन में किन्तु कसक है,
इस दीवाली की
यह एक झलक है!

10-
बंजारे नाचें
अँधियारों में
सेठ-शाह
रोशन गलियारों में,
किसकी दीवाली है
प्रश्न बड़ा तीखा है
कूचों में, दरबारों में!
**********

# प्रकाश प्रलय 
कटनी (मध्य प्रदेश)

1-
वही
दीप
सबसे भला,
जो
निस्वार्थ
भाव से जला!

2-
स्वच्छता अभियान को
रॉकेट के समान
गति दीजिए,
साफ़-सुथरा
उजाला
चारों तरफ़ कीजिए!

3-
असत्य पर
सत्य का
झंडा लहराएँ,
सद्भाव् पर्व पर
दिली शुभकामनाएँ!

4-
दर्द को
मैंने
अपना लिया,
तब जला
प्यार का
इक दिया!

5-
दीप पर्व पर
सकारात्मक रोशनी का
नया इतिहास रचें,
ओरिज़नल
पटाके चलाएँ-
नक़ली
नेतारूपी
ब्रांड से बचें!
**********

# डॉ शंकर क्षेम
बिजनौर (उत्तर प्रदेश)

1-
शब्दों के दीपों में
अर्थों का तेल भर
छन्दों का दीप जलाया,
वाग्देवी ने इस तरह
दीपोत्सव मनाया!

2-
लौटे राम
अवध-
करके असुरों का वध,
दीप जले शंख बजे
अवध के घर आँगन सजे!

3-
मिलकर सब
दीपावली मनाएँ
मन के दीप जलाएँ,
अँधेरा
दूर भगाएँ!

4-
नयी पीढ़ी
दीपों में तेल
नहीं भरती है,
‘स्विच-ऑन’
और
झालर लहरती है!

5-
जीवन के
कृष्ण पक्ष को
शुक्ल पक्ष बनाएँ,
आओ दीवाली मनाएँ!
**********

# शिव डोयले 
विदिशा (मध्य प्रदेश)

1-
नन्हा-सा दीपक
रोशनी का ख़्वाब
दिखा गया,
ज़िन्दगी को
अँधेरे से हटा
जीना सिखा गया!

2-
जगमगा उठी
रोशनी
हँसी ज़ोर से
मावस की रात,
नन्हा-सा दीपक
सुना रहा
सूरज वाली बात!

3-
दूर कहीं
एकांत में बैठ
दीपक पढ़ने लगा,
प्यार भरा ख़त,
तनमन महक उठा
देखे जो बाती के
दस्तख़त!

4-
दीवाली का
जगमगाता प्रकाश
लगा अमावस में
निकल आया
आफताब,
आँखें पढ़ने लगीं
उजाले के नाम
लिखी किताब!

5-
देखो कहीं
बुझ न जाये दीपक
कर लेना
आँचल की ओट,
हवा बड़ी चालाक
लग रही
मन में है खोट!

6-
आँधी को
चुनौती दे डाली
एक नन्हें-से
दीप ने,
थरथर काँपता रहा
अँधेरा!

7-
मोमबत्ती का जलना
और विरह में तपना
दोनों की
ख़ामोशी का
एक ही अंत है,
मोम बन जाना!
**********

# डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर
फतेहपुर (उत्तर प्रदेश)

1-
रात भर दीप जले
पर्व मना
काश, ऐसा ही
एक दीप जले
अन्तस् में,
उम्र भर!

2-
अमा ने फेर ली दृष्टि
सिकुड़ गया चाँद,
दैदीप्यमान धरा को देखकर
मुस्कुरा उठा गगन!

3-
आकाश झूम रहा
धरा के इशारों पर,
दीप भारी हैं
चाँद-तारों पर!

4-
चाइनीज़ दीपों की
चकाचौंध में
कुम्हार की आत्मा
तिलमिलाई,
मिट्टी बहुत रोयी!

5-
प्रेम-सद्भाव से
परिपूरित
हर पर्व है,
हमें अपनी संस्कृति पर
गर्व है!

6-
विचलित नहीं हुए
कण-कण में
प्रकाश भर गये,
दीप
अंधकार का
विनाश कर गये!

7-
दीप
तेल
बाती
ने मिलकर
ताक़त दिखायी,
चाँद-तारों की
शामत आयी!

8-
अबकी दीवाली
भाईचारे की
आतिशबाज़ी हो,
और उसमें
धू-धू कर
जल जाए-
भाई-भतीजावाद!

9-
देशी त्यौहारों में
विदेशी हवा से बचें,
भावी पीढ़ी के लिए
आदर्श रचें!

10-
सफलता के शिखर पर
दीप जलता है,
जब आदमी
सच की राह पर
चलता है!
**********

# दिनेश रस्तोगी 
शाहजहाँपुर (उत्तर प्रदेश)

1-
दीपक-राग
दीवाली की रात
पत्नी ने संगीतज्ञ पति से
दीपक जलाने को कहा ही था,
कि वे चिल्लाने लगे
गला फाड़ कर
दीपक-राग अलापने लगे!

2-
एक दिये ने दूसरे से कहा-
दिवाली के रिवाज़
समय के साथ कितने बदले,
और हम आज तक
बुझने को ही सदा जले!

3-
तम मिटाने को तो
तेल में डूबी बाती का
तन तिल-तिल मरा जिया,
कहने भर को
सिर्फ़ जला दिया!

4-
आयकर अधिकारी को
काला धन ले जाते देख
वे रुक गये इतना कहकर,
“लक्ष्मी को निकल जाने दो
बाहन पर सवार होकर!”
**********

# डॉ भावना तिवारी
नोएडा (उत्तर प्रदेश)

1-
नन्हें दीये हैं बच्चे
ज्ञान की बाती जलाओ
उजियारा फैलाओ,
दीवाली मनाओ!

2-
काजल पारा
बढ़ाती आँखों का
उजियारा
घर की रोशनी
मेरी माँ!

3-
अब
‘चिन्तकों’ को
त्यौहार भी
खलने लगे,
आदेशों की
बलि चढ़ने लगे!

4-
पानी से गूँधे
पैरों से रौंदे गए
आग में तपे
तब जाकर हुए प्रकाशित,
दीपावली सुवासित!

5-
खिल उठे
खील-बतासों-से चेहरे
शहर जगमगाया,
दीप-पर्व आया!

6-
प्रेम की लालिमा से
मन-आँगन लीप,
जलाओ अन्तर-दीप!

7-
चाइनीज़
चमक ने
रौंदे,
मिट्टी के घरौंदे!

8-
झोपड़ों में
बाँटकर मिठाई
उन्होंने दिवाली मनायी,
लक्ष्मी घर आयी!

9-
किसी के
पेट की आग
बुझाना,
लेकर संकल्प-
मिट्टी के दिये
जलाना!

10-
अंधकार में उजाला
निराशा में आशा
के बीज बोते,
नन्हें दीये
अंधकार से जीते!
**********

# डाॅ. वेदप्रकाश अंकुर
नैनीताल (उत्तराखण्ड)

1-
इस महँगाई ने तो
मेरी ज़िन्दगी में
बहुत ही दखल डाला है,
कि इस दिवाली ने तो
मेरा निकाल दिया दिवाला है!

2-
दिवाली में पता नहीं
क्या-क्या पंगे हो गए,
उन्होंने ताश के पत्ते खेले
और ज़ेब से नंगे हो गए!

3-
वो दीवाली में घर पर
साफ़-सफ़ाई रंग रोगन कर
ख़ुशी से झूल गए,
पर मन का कूड़ा-कचड़ा
निकालना भूल गए!

4-
वो कहते हैं-
आलस्य से साल भर
पड़े-पड़े मेरी बाॅडी
जंग खाती है,
दीवाली पर लक्ष्मी जी की
इतनी पूजा करता हूँ
पर ‘लक्ष्मी’ पास नही आती है!
**********

# डॉ. रमा द्विवेदी 
हैदराबाद (आंध्र प्रदेश)

1-
असंख्य दीपों का प्रकाश,
पर दूर न हो सका
झोपड़ी का अंधकार!

2-
ग़रीब का तन
क्षण प्रति क्षण जले,
फिर भी उसके घर
उजियार न पले!

3-
दीपावली की रात
जलती रही ढिबरी
देखने को प्रभात!

4-
दीपावली में
ज्ञान-दीप जलाओ,
राग-द्वेष-ईर्ष्या
दूर भगाओ!

5-
थोड़ी सी ख़ुशियाँ
बेसहारा बच्चों को दीजिए,
दीपावली का आनन्द
इस तरह भी लीजिए!

6-
दीये गढ़ता
मुफलिसी में जीता,
अंधेरों का गम
खुद ही पीता!

7-
बिकती है कला
कौड़ियों के भाव में,
मिट्टी के दिये गढ़ता जो
सदा रहता अभाव में!

8-
देशी हुनर बचाओ
आधुनिक रोशनी को छोड़
मिट्टी के दिये जलाओ!
**********

# चन्द्रप्रकाश पाण्डे 
रायबरेली (उत्तर प्रदेश)

1-
आओ
टीका करें
जोति का माथे पर,
अंधकार पी जाने का
त्योहार है!

2-
कसमसाती
बेतरह है
रात मावस की,
न जाने क्यों दीयों से
दुश्मनी उसकी
पुरानी हैं!

3-
तर-ब-तर है
देह सारी
रोशनी से,
और चोट्टिन रात काली
जिस्म में भीतर
छिपी है!

4-
हमारे दिल
बहुत काले
बड़े जाले,
दीवाली एक दिन की
अकेली क्या करे!

5-
दीये
रौशनी के लिये
पर रौशनी
कब हुई
दीयों की ख़ातिर!

6-
फिर
तुम्हारी याद आयी
और मन में गुनगुनाई,
तैरते हैं दीप
ज्यों जल धार में!

7-
अँधेरों में जिया हूँ
काल-गति का
भेदिया हूँ,
मैं दीया हूँ!
**********

# डाॅ. सुरेन्द्र वर्मा
इलाहाबाद (उत्तर प्रदेश)

1-
आज अमा की रात
छोड़ कर काला लिबास
ज़मीं से आसमां तक
बिखरा प्रकाश
श्रेय नन्हे दीप को!

2-
देखो तो ज़रा
छोटे हैं तो क्या हुआ
दीपक हम धरती के
तारे-से चमकते हैं
आकाश तक!

3-
कितनी ही देहरियाँ
हो गयीं बदरंग
ईर्ष्या से, क्रोध से
लीप कर वहाँ
रँगोली सजाओ!
**********

# डॉ. आनन्द प्रकाश शाक्य 
मैनपुरी (उत्तर प्रदेश)

1-
तोड़ तिमिर-कारा
दीप जगमगाये,
ख़ुशियों के दिन आये!

2-
वर्षों बाद
पुत्र मिला,
नेह का दीप
जला!

3-
साजन आये
मन रोमांचित,
कौंधी
नयनों में
सजल ज्योत!

4-
सृष्टि के उद्भव से
ज्योति के सम्बन्ध
गहरे हैं,
फिर भी
तम के
प्रकाश पर
पहरे हैं!
**********

# केशव शरण
वाराणसी (उत्तर प्रदेश)

1-
दीये की लौ
घायल होकर बुझ जाती है
पटाखों से,
मैंने देखा है
अपनी आँखों से!

2-
कैसे-कैसे अँधेरे
हमारे मन में
अवसादी कालिमा भरे
तन से मैल की तरह चिपके थे,
लेकिन आज हम
ज्योति-स्नान के
उल्लास में बह रहे!

3-
यह फुलझड़ी ठीक है
वह अनार भी
यह लतर भी
इस त्यौहार पर,
एटमबम
और राकेट की
ज़रूरत क्या?

4-
मिट्टी के लाखों दीये
जिस रात जलते हैं
दीपावली होती है,
मगर क्या बात कि
प्रेम का एक दीया जले
हर रात हो दीपावली!
**********

# डॉ. रंजना वर्मा
पूणे (महाराष्ट्र)

1-
घना अँधेरा
मानव भयभीत
हँसा दीप
काफ़ी हूँ मैं
लड़ने को तम से
मत डरो
में हूँ न!

2-
हँसते दिये
रजनी भर जिये
सुबह सोये
थके-माँदे!

3-
माटी का तन – दीप
साहस का स्नेह भरा
उमंग की बाती
बिखेरती रहे
प्रेम का उजाला
मृत्यु-पर्यन्त!

4-
धूप ने छुआ
दिया कुनमुनाया
सो लेने दो
थोड़ा और
कर लेने दो
शक्ति संचय,
रात तो फिर आयेगी!

5-
जगमगाते दीपों ने
पहन लिये
धुँए के लिबास,
विदा हो गयीं
रौशनियाँ
तेल चुकते ही!

6-
कहे दीपावली-
ख़ूब सजाओ
‘इलेक्ट्रानिक झालरें’
जगमगा उठे घर-आँगन,
किन्तु कुछ देर तो
जला लो मिट्टी के दीप
जलने दो चूल्हा
कुम्हारों का भी!

7-
बच्चे जलाते
पटाखे
गलियों-चौराहों पर
फैलने लगा
ज़हरीला धुँआ
बढ़ गया
बाबा का दमा!
**********

# पुष्पा सिंघी
कटक (उड़ीसा)

1-
माटी का पुतला
अथक श्रम से
माटी के दीये गढ़ता,
झोपड़ी में बैठा
बाल-गोपाल
बारहखड़ी पढ़ता!

2-
जिस घर में
अनादृता हो गृहलक्ष्मी,
कोई बताये
वहाँ पर
कैसे आयेगी महालक्ष्मी?

3-
देशी मकान
विदेशी सामान
ख़ूब जगमगाहट है
न जाने क्यूँ
मन में अजब
छटपटाहट है!

4-
हे प्रभो!
तेरी अयोध्या में
आस का दीया
निशदिन जलता है,
तुम आओगे
अच्छे दिन लाओगे
यही स्वप्न पलता है!

5-
देहरी-दीप सी
वह निशदिन जली
उस गेय में
मनती रही दीपावली!

6-
फुलझड़ी अनार
कुछ पलों में
राख हो गए,
कितनी जल्दी
किसी के सपने
खाक हो गए!

7-
झोपड़पट्टी में लोग
खील-बताशे खाकर
दिवाली मना रहे हैं,
बंगले में बड़े साहब
सलीके से बैठकर
उबली सब्जी खा रहे हैं!

8-
मोम की पुतली
रोशनी बाँटते-बाँटते
पिघल गई,
शायद उसमें
संवेदना
नारी-हृदय की
ढल गई!

9-
दीपक जलकर
सार्थक करता जन्म,
आदमी जलकर
आदमियत करता ख़त्म!
**********

# डॉ. पूर्णिमा राय
अमृतसर (पंजाब)

1-
देहरी पे रखा दीप
जल उठा स्वयं ही,
जब विदेश गया पुत्र
लौट आया
माँ से मिलने!

2-
बिटिया के चरण
पूजे पिता ने,
जल उठे दीये
लक्ष्मी पूजन से पहले
बिना बाती के ही!

3-
झिलमिल-झिलमिल
दीप सजे हुए हैं
कतारों में,
प्रेम पनप रहा फिर से
घर-परिवारों में!

4-
तुम्हाने आने से
रौशन हुआ
दिल का कोना-कोना,
लगा-
जल उठे दीये
दीवाली के!

5-
अहम् की जूठन से
दूर हुये दिल,
शबरी के जूठे बेरों-सी
मिठास दिखी
दीपावली की मिठाई में!

6-
बीते वक्त की यादों संग
बुझे हुये दीये
हर बार जलने लगते हैं
दीपावली में,
प्रिय-मिलन की चाह में!

7-
दीप-पंक्ति
झिलमिलाई,
मानो
नवयौवना ने
ली हो
अँगड़ाई!

8-
हो गया
हल्ला-गुल्ला
गुल हो गयी बिजली,
जलती रही
स्नेह में वर्तिका
दीवाली पे मनचली!
**********

# डॉ. बीना रानी गुप्ता 
लखीमपुर (उत्तर प्रदेश)

1-
कुम्हार गढ़े
प्रकाश के दिये,
ज्यों कवि रचे
छंद नित नये!

2-
उजास-पर्व
पत्नी निहारे पंथ,
पिया ने लिया
देश रक्षा का संकल्प!

3-
पटाखों की गूँज,
ग़रीबी बीने
कूड़े में बिनजले
पटाखों से
दीवाली की धूम!

# ऋता शेखर ‘मधु’
बंगलुरू (कर्नाटक)

1.
ज्योति की चाह में
संग-संग डोल रहा
वो पतंगा
मन मतंगा
जान से गया
रहा नादान!

2-
एक दीया
करे रौशन हजार दीये
शहीद की दहलीज़
अंधकार में डूबी,
कौन-सा दिया-
कर सकेगा रौशन?

3-
रंग-बिरंगे
पटाखे-फुलझड़ियाँ
फलता-फूलता बाज़ार
मुरझाई है जेब,
धनतेरस चाहे
रत्नजड़ित पाजेब!

4-
ताउम्र
रौशनी की ललक
बन जाए न
बोझिल सनक
कभी देखना
बुझी वर्तिका की रास,
चुके हुए तेल संग
दे जाती है आस!

5-
लक्ष्मी को आता रास
सफर
इस जेब से
उस जेब तक का
कँजूस जमाखोर के घर
तिजोरी में बंद
उकताती रही,
नोटबंदी में
गंगा की धार पर
मुस्काती रही!

6-
जली कंदील
कुलिया में बताशे-खील
शुभ को आँकती
संपत्ति की प्राप्ति
रमुआ की झोपड़ी
नन्हें की मुस्कान
सौ दीपकों के समान!

7-
सम्मान दीजिए
सम्मान पाइए,
ज़रूरतमंदों को कुछ देकर
दीपावली मनाइए!
**********

# सन्दीप सरस
सीतापुर (उत्तर प्रदेश)

1-
स्वयं गलकर
जगत को देता
उजाला,
वह दीप है!

2-
किसी ग़रीब की
अँधियारी चौखट पर
रखें कुछ दीप,
दीपावली मनाएँ!

3-
राम का राज्याभिषेक
समस्त आनन्दित
कैकई
अपराधबोध से व्यथित,
इसे कहते हैं
चराग़ तले अँधेरा!

4-
जब हमें
मन की स्वच्छता और
आत्मबल के उजास पर
स्वयं हो गर्व।
तब मानिए
सार्थक हुआ
प्रकाश-पर्व।

5-
भौतिक तम से
कहीं महत्वपूर्ण
मन के तम को
दूर भगाएँ,
दीपावली मनाएँ!
**********

# देवी चरण कश्यप ‘अक्स’
कानपुर (उत्तर प्रदेश)

1-
पर्यावरण की रक्षा हेतु
पटाखों को जलाकर
मत फैलाओ प्रदूषण
दीपपर्व पर भाईचारा
प्रेम एवं शान्ति का संदेश
फैलाकर बन जाओ,
समाज के कुलभूषण!

2-
घर, दफ़्तर, दूकान की
करो साफ़-सफ़ाई ,
दीपावली का त्योहार
स्वच्छता अभियान की
करे अगुवाई!

3-
एक-दूजे को
बधाई देने की परम्परा
सदियों पहले से चली,
आप सभी के जीवन में ढेरों
खुशियाँ लाये-
शुभ दीपावली!

4-
पधारो घर में कुबेर
लक्ष्मी और गजानन ,
दीपावली पर्व पर
हम करते हैं-
सादर अभिवादन!

5-
देश हो या विदेश,
दीप-पर्व सारी दुनिया को
देता है
ख़ुशियों का सन्देश!

6-
दीप पर्व पर प्रभु
कुछ इस तरह
करो उजियारा,
मिट जाए-
हृदय में बैठा
अँधियारा!

7-
दीपावली पर मत जलाओ
तेज़ आवाज़ का पटाखा,
किसी रोगी के दिल में
कर न दे धमाका!
**********

# त्रिलोचना कौर
लखनऊ (उत्तर प्रदेश)

1
दिये ने मुस्करा कर कहा
प्रकृति की रीत
या दिल की मज़बूरी है,
किसी एक की ख़ुशी मे
दूसरे का जलना ज़रूरी है!

2-
दीपावली की रात
चारों तरफ़ रोशनी
होती रही
दिये जलते रहे,
चिराग तले अँधेरे
पलते रहे!

3-
मुफ़लिसी के आँगन मे
दो-चार जलते दिये,
भूखा पेट
बुझते दिये
दोनो एक जैसे लगे!

4-
आशाओं की
बाती बनकर
उम्मीदों का दिया जलाना,
चाहे जितनी बार बुझे
हर बार जलाना!

5-
सारे दिये
मत जलाना
तम का अस्तित्व
मत मिटाना,
स्वप्न और कल्पनाओं
की बस्ती
अँधेरों मे ही बसती है!
**********

# गौरव वाजपेयी ‘स्वप्निल’
मुज़फ्फरनगर (उत्तर प्रदेश)

1-
अँधेरे
छलते रहेंगे,
पर दीप
जलते रहेंगे!

2-
पोछने को कालिमा,
दीप ज़रूरी है-
तेरी लालिमा!

3-
सित-असित तो
प्रकृति के दो रूप हैं
असित की सत्ता प्रबल है
किन्तु सित भी नव-धवल है
सित-असित संघर्ष में ही
दीप जलते,
स्वप्न पलते!

4-
आ गई
फिर छा गई
हर्ष के क्षण दे गई
दो घड़ी दुःख ले गई
ज्योति की अनुपम कली,
दीपावली!

6-
पटाखों पर बैन है
बाल-मन बेचैन है,
दीप
कितने भी जलें
पर
नीरस घनेरी रैन है!
**********

# अरुण सिंंह रुहेला 
मेरठ (उत्तर प्रदेश)

1-
अकेले परदेश में
न जलाये दिये
न सजायी रंगोली,
कम्प्यूटर स्क्रीन पर मनायी
डिजिटल दिवाली!

2-
दीवाली की रात
मत भूलो तुम
बारूद जलाते
कि इन्हीं चिनगारियों से
फैलेंगे-
प्रदूषण के रावण
हजार सर वाले!
**********

# प्रिन्स मंडावरा 
मुज़फ्फरनगर (उत्तर प्रदेश)

1-
मासूम बच्चे
अरमानो को मार
चूल्हे के लिए,
बेचते दिये!

2-
छोड़कर अपना घर
सभी के घर सजाती
मोहल्ले की बाई,
दीवाली आयी!

3-
बँटने लगी
दिखावे की मिठाई
दीवाली के शुभ-संदेश,
एकान्त बैठे गुमसुम
घर के बुजुर्ग!

4-
बिजली सजाये
घर-चौबारे,
बोझ को ढोता
कुम्हार का चाक!

5-
आँसू पिये वह
बुझे मन से
जलाता दिये,
कल फिर होगी
रोटी की तलाश!

6-
बोलकर ‘जयहिन्द’
यादों में खो गयी,
शहीद की बेवा की
दीवाली हो गयी!

7-
सरहद पर तैनात
अपनों से दूर
अपनों के लिए
आओ मिल जलाएँ,
एक दिया
वीरो के नाम!

8-
कैसे जलाएँ
दीवाली पर दीप
बेरोज़गार युवा,
मन न हुआ!
**********

# डॉ. ज्ञानेन्द्र गौरव
फतेहपुर (उत्तर प्रदेश)

1-
लक्ष्मी-गणेश
का पूजन
नया बहीखाता,
मग़र
हिसाब सब पुराना
कुछ समझ नहीं आता!

2-
राकेट/बम
पटाखों का शोर
विषैला धुँआ
अकेली रोशनी
कमज़ोर होती
साँसों की डोर!

3-
जर्रा-जर्रा
ज्योतिर्मय हो फैलें
नभ जैसा तन जाएँ,
आओ मिलकर
दीप जलाएँ!

4-
राम आएँ या रावण
दीये घी के जलेंगे,
हम कहतें हैं-
परिपाटी बदलो,
लोग कहते हैं-
नियम नहीं बदलेंगे!
**********

# चंचला इंचुलकर सोनी
इन्दौर (मध्य प्रदेश)

1-
उजाले की छुअन
फूटा है आज
पुरातन पुण्य,
दीप प्रज्वलन!

2-
रोशनी से निवेदित
लक्ष्मी का गृह-प्रवेश,
लो हो गया
ख़ुशियों का
श्री-गणेश!

3-
जली फुलझड़ी,
धरती पर उतार लाई
सितारों की लड़ी!

4-
दियों-पटाखों के साथ,
बेहाल हुई
अमा की रात!

5-
टिमटिमाती लौ
हवा,
तम से लड़ती
हौसलों को बुनती!

6-
दीप जले
पकवान महके
पूजा-प्रार्थना
हँसी ठिठोली
जुड़ी अपनों से कड़ी,
आयी अनमोल घड़ी!

7-
प्रेरणा का
सबल स्पंदन,
जाति-धर्म से परे
माटी का दीप
दे ख़ुशी अनगिन!
**********

# बृजेश अग्निहोत्री ‘पेंटर’
फतेहपुर (उत्तर प्रदेश)

1-
बच्चों की
घर वापसी की
उम्मीद ने
बूढ़े माँ-बाप को फिर छला,
जब दीवाली में
दीयों के साथ दिल जला!

2-
पाण्डवों ने
द्रौपदी की दी दुहाई
द्यूत में दुर्योधनों ने जीत पाई,
दीप के नीचे बुराई!

3-
हर बरस
दीपावली में
दीपकों से घर सजे,
किन्तु दिल के गर्त तक
वह रोशनी आती नहीं।
अमा की रात जाती नहीं!

4-
दूसरों को
दे उजाला
दीप खुद को छल गया,
अज्ञान का घन-तिमिर
नीचे पल गया!

5-
हर दीवाली
शहरी बाबू
ऊसरभूमि जगाता,
जगो-जगो
धरतीमाता!

6-
घना तिमिर देख
मोमबत्तियाँ खड़ी हो गईं,
गलकर भी
सबकी नज़रों में
बड़ी हो गईं!

7-
जब
दीवाली में
सफेदी ने
महल की चौखट छुआ,
हँस पड़ा
दीवार में बुझते
चिरागों का धुँआ!
**********

# डॉ. शशि जोशी ‘शशी’
अल्मोड़ा (उत्तराखंड)

1-
कोई फुलझड़ी
कोई बम
कोई रॉकेट दागे,
और कलुआ बेबसी से
इस मंजर को ताके!

2-
इस दीवाली को
यूँ भी सँवार लें,
घर-आँगन के संग -संग
दिल भी बुहार लें!
**********

# दिनेश गुप्ता
कानपुर (उत्तर प्रदेश)

1-
वे
अँधेरी कुटिया में रहकर
औरों के घर
रौशन कर रहे है,
दिल के घाव
सी रहे हैं!

2-
दीप-से क़तार में खड़े हो,
अँधेरे जीवन में
रौशनी ला रहे हैं,
सलाम इन्हें
जो उजाले पर उजाला
फैला रहे हैं!

3-
तम लिए
कार्तिक अमावस्या,
कुछ नया कर जाती है,
अँधेरे और उजाले का
सही धर्म बताती है!

4-
अमावस की
काली रात का,
अँधियारा भी शर्मा गया,
जब एक दिये ने
अपने वज़ूद का
एहसास करा दिया!

5-
समृद्धि की देवी ने
दिये का मान
बढा दिया,
जहाँ पर देखी रोशनी,
वहीं धन बरसा दिया।
**********

# महेंद्र कुमार वर्मा 
भोपाल (मध्य प्रदेश)

1-
एक दीप जला
मायूस होकर
तिमिर चला।

2
दीपक
खुद जलकर
उजियारा लाया,
तिमिर
तिलमिलाया।

3-
गोरी जो हँसी
एक फुलझड़ी
झिलमिलाई,
ग़म के
फुसफुसे बमों ने
मुँह की खायी!
**********

# आशा सक्सेना 
मैनपुरी (उत्तर प्रदेश)

1-
नेह की रीति चला दे,
हे दीपमालिके
प्रियतम से मिल
सुधि का दीप जगा दे!

2-
धरती से मिला दहेज
लुभा नहीं पाया,
अमा की रात सज गयी
आकाश
चाँद को
नहीं लाया!
**********

# ज्योतिर्मयी पन्त 
गुरुग्राम (हरियाणा)

1-
नन्हें जलते दियों के साथ
ख़ुशहाली की आस जगी,
दीवाली की रात!

2-
सजी रंगोली
बंदनवार हर आँगन-द्वार
माँ लक्ष्मी का
सभी को इंतज़ार,
न हो कोई निराश
अब की बार!

3-
कुम्हार से दीपक
किसान से कपास
तेली से तेल
लेकर जलें
जब दिये,
होगी पर्व की ख़ुशी
सभी को!
**********

# विनोद सागर 
पलामू (झारखण्ड)

1-
तम पर
प्रकाश की
जीत,
आओ जलायें
दीप!

2-
दीया जलाने से
जगमग दिख रहा
घर तुम्हारा,
और पाकर तुम्हें
रौशन है
जिगर हमारा!

3-
बहुत अँधेरा है
जीवन में,
मगर उम्मीद का
एक दीया जलाकर
ज़िन्दा रखा है
मेरे हौसलों ने!

4-
दिल और दीया
दोनों जल रहे हों
जब साथ-साथ,
फिर ऐसे में
कोई कैसे मनाये
ग़म और ख़ुशी
साथ-साथ!
**********

# बालिका सेनगुप्ता 
लखनऊ (उत्तर प्रदेश)

1-
टूटे रिश्ते
फिर से बना लो,
गले मिल लो
दीवाली मना लो!

2-
ज़िन्दगी की अमावस में
वह अपनी सीता संग
भटक रहा है,
अपने हिस्से का वनवास
गटक रहा है!

3-
तमस और ज्योति के
युद्ध में
उजाले को प्रणाम है,
अबकी दीवाली
शहीदों के नाम है!

4-
सदियों से
जलता आ रहा हूँ
आगे भी जलता रहूँगा,
अंधकार को चीर
प्रकाश भरता रहूँगा!
**********

# अनिल मानव
इलाहाबाद (उत्तर प्रदेश)

1-
जलीं दीपलड़ियाँ
खिलीं-
मन में कलियाँ
रोशन हुए गाँव-नगर,
प्रकाश ने
जीत लिया समर!

2-
हर दर में
एकसम
उजियारा करता,
दीप
सूर्यसम है
भेदभाव नहीं करता!
**********

# पीयूष कुमार द्विवेदी ‘पूतू’
फतेहपुर (उत्तर प्रदेश)

1-
अम्मा बोली
माटी के दीप ही
जलाओ,
संस्कृति देश की बचाओ!

2-
आले-आले कभी
पार्थिव दीप जलाते थे,
आजकल रंग-बिरंगी
झालरें लटकाते हैं!

3-
अमा का वजूद
फीका है!
जग के भाल पर
दीपों का टीका है!
**********

# मंजु गुप्ता
मुम्बई (महाराष्ट्र)

1-
‘बेटी बचाओ – बेटी पढ़ाओ’ का
लेकर संकल्प
करें लक्ष्मी पूजन,
न हो अब कोख में हत्या
प्रण ले जन-जन!

2-
इस दीवाली पर
देश को राम मिलें,
जिससे भ्रष्टाचार की बाढ़ पर
नकेल लगे,
और रामराज्य आये!
**********

# अनीला बत्रा
जालंधर (पंजाब)

1-
दीपावली
सार्थक कर लो,
किसी ग़रीब की
कुटिया में
प्रकाश भर दो!

2-
छूटा हाथ में पटाखा
हुई ज़ोर की हलचल,
बरबस
याद आ गया-
माँ का आँचल!

3-
आँखों से बह निकली
आँसुओं की लड़ी,
जब देखा-
झोपड़पट्टी की लड़की को
कूड़े के ढेर में बीनते
अधजली फुलझड़ी!
**********

# डॉ. उम्मेदसिंह बैद
कोलकाता (पश्चिम बंगाल)

1-
चलो यह ख़र्च तो बचा
बच्चों को
कोर्ट का नाम लेकर
बहला दूँगा,
कि फुलझड़ियों का धुँआ
साँसों पर भारी है!

2-
बरसाती कीचड़
भिनभिनाते मक्खी-मच्छर
डेंगू-चिकनगुनिया
दूर शहर
और भी दूर दवाखाना,
निकट आई दीवाली!
**********

# रेणु चन्द्रा माथुर 
जयपुर (राजस्थान)

1-
माटी का नन्हा दिया
अँधेरे से लड़ा,
जग रौशन किया
हौसला बड़ा!

2-
निर्धन के घर में भी
दीप जलाएँ
सबके मन में
उजियारा भरें,
इस दीवाली
कुछ नया करें!
**********

# राम कुमार सुरत
सीतापुर (उत्तर प्रदेश)

1-
दीपक की रोशनी मे
सब उजले हैं,
पर भीतर से
एक-दूसरे के
उजले होने पर
मचलें हैं!

2-
वे
घर का कूड़ा
सड़क पर फेंककर
दीवाली मना रहे हैं,
और हमें
‘स्वच्छ भारत मिशन’
का पाठ पढ़ा रहे हैं!
**********

# संतोष बैद
पूर्णिया (बिहार)

1-
तेरे लौंग का
लश्कारा
तेरी बिंदिया की
लाली,
अपनी तो हर रात
दीवाली!

2-
मिट्टी के दिये
फिर से जलें
दुआ है-
कुम्हार के चाक
फिर से चलें!
**********

# रुबी प्रसाद 
सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल)

1-
बच्चे
पटाखों संग
मचा रहे शोर,
लक्ष्मी जी देख
मुस्काईं
घूमे चहूँ ओर!

2-
फेसबुक पर
बधाइयाँ बाँट रहा बेटा,
माँ
वृद्धाश्रम में
ताक रही
बेटे की राह!
**********

# निधि कुनवर्णी
बोटाद (गुजरात)

1-
दीवाली से पहले
चमकने लगे
घर-आँगन,
काश ऐसे ही चमके
हमारा मन!

2-
अमा की रात भी
हो सकती है
पूनम की तरह
उजली,
बस सारे दीपक
मिलकर जलें
एक साथ!
**********

# रेनू सिंह 
फ़िरोज़ाबाद (उत्तर प्रदेश)

1-
घर में उजाला हुआ
जब जला
माटी का दीया,
चाक पर चलते हाथ ने
मन को छुआ!

2-
जब
लक्ष्मी पूजन हेतु
बैठा परिवार एक साथ,
थम गई दौड़ जिन्दगी की
नेह
बरसा अपार!
**********

# रीता कुमारी 
पटना (बिहार)

1-
अधर्म पर धर्म की
असत्य पर सत्य की
जीत है दिवाली,
इसी तरह जीवन में
उद्दीप्त हो दिवाली!

2-
सम्पूर्ण सृष्टि का
अंधकार मिटाकर
यों ही जलता रहे
आस का यह दीया,
मनाये उत्सव
मन-पपीहा!

3-
घर-आँगन में फैली
सुख-समृद्धि की लाली
हँस दी
रात काली,
दीपमालिका से सजी दीवाली!

4-
दीपावली आयी
तिमिर भागा
उल्लास बढ़ा,
उत्साह का पारा चढ़ा!
**********

# मधु छाबड़ा ‘महक’
टैगोर गार्डन (नयी दिल्ली)

1-
एक दीपक
साँझ के गलियारे में
सूरज की विदाई पर
इस उम्मीद से जलाया,
सरहद से जीत का सेहरा
सर अपने बाँध कर
देखो परदेसी
दीपावली को लौट आया!

2-
आस का एक दीपक
उस छोटे से घर के बाहर
एक नन्हीं परी
बड़े प्रेम से जलाती है,
लाख मन्नतें
रब से मनाती है!

3-
नेह के प्रकाश-पुंज से
प्रीत की रंगोली सजा
विश्वास के दीप
जलाती हूँ,
मैं दीवाली मनाती हूँ!
**********

# सपना बाजपेई
सीतापुर (उत्तर प्रदेश)

1-
वसुधा की
हथेली पर
अम्बर ने घर बनाया,
इस दीवाली
तारों की भेंट लाया!

2-
आओ फुलझड़ी से
फुलझड़ी जलाएँ,
अनेकता में
एकता की बाती
जलाएँ!

3-
दुविधा कोई नहीं,
अभी दिए में
तेल बाकी है
चंद और दिए लाओ
जलाओ,
बाती में ज्योति
शेष है!

4-
दिवाली की रात
माँ ने
काजल बनाया,
लगा उसे मेरी आँख में
हर बुरी
नज़र से बचाया!

5-
हो रही रोशन निशा
दीपों की
चंद कतारों से,
पड़ रही हैं
धरा पे परछाइयाँ
सितारों की!
**********

# संगीता पाठक 
सहारनपुर (उत्तर प्रदेश)

1-
फुलझड़ियों-सा
मन में
उजास दमके,
जीवन
दीवाली-सा चमके!

2-
ज़िन्दा रहती है मंथरा
केकैई की विचारधारा
भावनाएँ
छली जाती हैं
दीवाली आती है,
और चली जाती है!

3-
शहीद के घर
दीवाली,
तमगों के साथ
यादों की थाली!
**********

# डॉ. रूपेन्द्र कवि
जगदलपुर (छत्तीसगढ़)

1
चाइनीज़ दिये
भले ही बिक रहे
ताबड़तोड़ हैं,
आज भी
मिट्टी के दियों का
नहीं कोई जोड़ है!

2-
प्रदूषण रहित
दीपावली
मनाइए,
भावी पीढ़ियों के लिए
ख़ुशियाँ सहेजिए!
**********

# आभा सिंह 
जयपुर (राजस्थान)

1-
आस का कंदील
टाँग दिया है छत पर
उजियाले
गलियों में भर रहे,
शुभकामनाओं को
दिशा मिलेगी!

2-
आलोक पर्व पर
याद का एक दीप
बालती हूँ,
अभिमान धरे
इस मान को
झिलमिली प्रतीक्षा है-
तुम्हारे स्वीकार की!

3-
तप संयम से
मन को बालो
अँजुरी स्नेह की
आधार बने,
यों उजाले का
पर्व मने!

4-
खिड़की
बंद करने से
नहीं होती क़ैद
रोशनी,
वह झाँकती है
झिरियों से
खिलखिलाती हुई!
**********

# मीनाक्षी मेहरा 
अमृतसर (पंजाब)

1-
एक लम्बी अमावस्या
गुजर गई
हमारे दरमियाँ,
आज रोशन किया है
दर अपना
जला कलेजा
बन कर दिया!

2-
राष्ट्र कुछ लोगों
का जमावड़ा नहीं
रोशनी का सैलाब है
दीयों का रुआब है,
पटाखों का इन्कलाब है!
**********

# डॉ. विनीत कश्यप 
लखनऊ (उत्तर प्रदेश)

1-
रोशनी से नहायी
धरती को
अम्बर ताक रहा है,
दीवाली का
अद्भुत नज़ारा
उसे बहुत
रास आ रहा है!

2-
जगमगाती धरती देख
क्षितिज के तारे
घबड़ाये,
अम्बर छोड़कर
वे धरती पर
दीपक की लौ में
नज़र आये!
**********

# डॉ. सोनिया गुप्ता 
महोली (पंजाब)

1-
जली मैं
रात भर
पिय की प्रतीक्षा में,
और नाम हुआ
मिट्टी के दीये का!

2-
रात भर
उसकी देह
पड़ी रही जमीन पर
अंतिम विदाई के लिए,
और एक दीया
नज़दीक जलता रहा!
**********

# नीरजा मेहता
गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश)

1-
मैं अल्प में भी
चुन लेती हूँ विकल्प
मैं अपर्याप्त में भी
समेट लेती हूँ पर्याप्त
नहीं सीखा मैंने रुकना
मैं बाती हूँ!

2-
दीपक
तेल की अंतिम बूँद तक
जलता है
और बुझने पर
अपनी खुशबू छोड़ देता है,
माँ तुम
उसी दीपक जैसी हो!
**********

# केकी कृष्णा 
हाजीपुर (बिहार)

1-
उन्होंने
हजारों दिए बनाये,
खुद
एक भी नहीं
जला पाये!

2-
चाँद-तारों से
सजी महफ़िल है
हर दिन
दीवाली
हर दिन ख़ास है,
तुम मेरे पास हो!
**********

# वीपी ठाकुर,
कुल्लू (हिमाचल प्रदेश)

1-
बाती है ज़िन्दगी
जलना सुनिश्चित है,
दीपक की तरह!

2-
जग में छायी
अमा जलेगी,
उम्मीद है-
इस दीवाली
मानवता के दीपक में,
दया-धर्म की लौ जलेगी!
**********

# राजन लिब्रा ‘राज’
अमृतसर (पंजाब)

1-
जिसने भी खेला
दीवाली पर जुआ,
स्वयं के लिये खोदा
उसने
मौत का कुआँ!

2-
श्रीराम के आदर्शों को
जीवन में
अपनाना होगा,
समाज में
समता और सम्मान
लाना होगा!
**********

# पंकज टेम्भरे ‘कुमार’
बालाघाट (मध्य प्रदेश)

1-
चाइनीज दीप
माटी के दीप का
कुछ नहीं कर पाये,
कुम्हार मुस्कुराये!

2-
मिट्टी के दीप तो
ग़रीब जलाएँगें,
चाइनीज दीप जलाने वाले
फेसबुक और ह्वाट्सऐप पर
‘निषेध’ वाले संदेश
फैलाएँगे!
**************

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1 COMMENT

  1. एक बेहतरीन एवं विशाल चुनिंदा क्षणिकाओं का संकलन!!श्रम साध्य !!कम समय में फलित हुई योजना!! निस्वार्थ साहित्य सेवा का सटीक उदाहरण!!
    सभी प्रकाशित रचनाकारों को हार्दिक बधाई!!

    डॉ.शैलेश वीर जी आपका हार्दिक आभार!!

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