बाल कविता (डाल पे पंछी)

0
169

 डाल पे पंछी —-(दोहे)

बैठा पंछी डाल पे, मन की बात बताय।
बिन पानी मरने लगे ,कैसे जान बचाय।।

बैठी कोयल डाल पे,मीठा गान सुनाय।
कांटे चुनके राह के,मंजिल कदम बढ़ाय।

बैठी चिड़िया डाल पे, आँखें नीर बहाय।
बेटी रत्न अमोल है ,हिय में रखें बसाय।।

बैठी मैना डाल पे, अपना शीश झुकाय।
जीवों का वध पाप है,पाप विनाश कराय।।

बैठी बुलबुल डाल पे,रह-रह के घबराय।
माँ मुझको मत मारना,लाख कोइ बहकाय।।

बैठा कौआ डाल पे, चुप की राह दिखाय।
कड़वी वाणी विष भरी, हियरा दुख पहुंचाय।।

बैठा तोता डाल पे, मीठे वचन सुनाय।
मात-पिता मत छोड़ना, सेवा-धर्म निभाय।।

बैठा उल्लू डाल पे,इत-उत है मंडराय।
आंख मूंद चलना नहीं,ज्ञान की लौ जगाय

  • डॉ०पूर्णिमा राय
Loading...
SHARE
Previous articleरोशनी के दीप हर घर में जलाइये
Next articleजीत सूर्य सी by Dr Purnima Rai
अचिन्त साहित्य (बेहतर से बेहतरीन की ओर बढ़ते कदम) यह वेबसाईट हिन्दी साहित्य--गद्य एवं पद्य ,छंदबद्ध एवं छंदमुक्त ,सभी प्रकार की साहित्यिक रचनाओं का रसास्वादन करवाने के साथ-साथ,प्रत्येक वर्ग --(बाल ,युवा एवं वृद्ध ) के पाठकों के हिन्दी ज्ञान को समृद्ध करने एवं उनकी साहित्यिक जिज्ञासा का शमन करने हेतु प्रयासरत है। हिन्दी भाषा,साहित्य एवं संस्कृति के विपुल एवं अक्षुण्ण भंडार में अपना साहित्यिक योगदान डालने,समाज एवं साहित्य के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह करने हेतु यह वेबसाईट प्रतिबद्ध है। साहित्य,समाज और शिक्षा पर केन्द्रित इस वेबसाईट का लक्ष्य निस्वार्थ हिन्दी साहित्य सेवा है। डॉ.पूर्णिमा राय, शिक्षिका एवं लेखिका, अमृतसर(पंजाब)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here