गौतम काका (लघुकथा)

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गौतम काका (लघुकथा)

गौतम काका की खाँसी ठीक नही हो रही है, अपने बेटे सोनू के कहने पर डॉक्टर के पास गये, डॉक्टर ने उनके बेटे को अकेले में बुला कर कहा “आपके पिता जी को शायद टीबी हो गया है, कल आप एक्स-रे कराके फिर आईये। कुछ दवाइयाँ लिख दे रहा हूँ , अभी फिलहाल घर ले जाईये।”
सोनू अपने पिता को घर लें जा रहा था तो उसके मन मे तरह-तरह के सवाल उठ रहे थे, “क्या करूँ, कैसे पैसे का इंतजाम करूँ। अब तो बाबू जी भी बूढ़े हो गए है, ज्यादा से ज्यादा साल भर के मेहमान हैं। दोनों भाई अपने अपने बाल-बच्चों के साथ मौज-मस्ती से शहर में रह रहे हैं, और हमारे ऊपर पूरा का पूरा बोझ छोड़ दिये।”
सोनू की चेहरे के हाव-भाव से गौतम काका समझ गये थे कि डॉक्टर ने कुछ गंभीर बात कही है, इसीलिए इसके चेहरे का हाव-भाव बदल गया है।
गौतम काका खुद-ब-खुद बोलने लगे “यह डॉक्टर लोग केवल लूटना जानते हैं। एक खाँसी होने पर इतनी दवाई लिख दी, मैडीकल स्टोर से यह लोग कमीशन लेते हैं, इसीलिए बेकार की पैसे ऐंठते हैं,हम जैसे गरीबों से !अब मैं यही दवाई खाकर ठीक हो जाऊँगा, अब मुझे किसी डॉक्टर-साॅक्टर के यहाँ नही जाना हैं।”

जियाउल हक
जैतपुर सारण बिहार

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