ये बेचारी दीवारें !

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ग़ज़ल

बंटवारे की पीड़ा सहतीं ,ये बेचारी दीवारें !
किसको अपना दर्द बतायें ,वक़्त की मारी दीवारें 

छोड़ के अपना गाँव ,शहर तुम निकले थे जब खुशी -खुशी ,
उस दिन फूट -फूट कर रोई ,घर की सारी दीवारें !

एक खंडहर की सूरत में ,वीराने में पड़े -पड़े ,
किसका रस्ता तकती हैं ,ये टूटी -हारी दीवारें !

देख रहीं हैं गुमसुम होकर ,हिस्सा -बाँट जमीनो का ,
बेबस बूढ़ी माँ के जैसी ,हैं दुखियारी दीवारें !

छत का बोझ नही है सर पे ,हैं बेहद आज़ाद अभी 
इसीलिये कुछ इतराती हैं ,अभी कुंवारी दीवारें !

परदेसी बेटा लौटा है ,सारा घर है खिला -खिला !
चहक उठी हैं माँ के संग में प्यारी -प्यारी दीवारें 

बह्र—22 22  22  22 ,22 22 22 2

काफिया–आरी //रदीफ –दीवारें


डॉ .शशि जोशी
जी .जी .एच .एस .बाँगीधार .सल्ट
अल्मोडा (उत्तराखंड )
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