सिला देगा कोई क्या बंधनों का

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सिला देगा को’ई क्या बंधनों का।

सिला देगा को’ई क्या बंधनों का।
नहीं है खेल यूँ जुड़ना दिलों का।।

हमें भाने लगा है आइना जो,
चला है दौर फिर से चाहतों का।

कमाते बीत जाती उम्र सबकी,
मिला है वक़्त किसको फलसफ़ों का।

विदा जब होती बेटी मायके से,
हुआ तुम खून देखो हसरतों का।

लिखा है क्या जो हम ऐसे हैं उलझे,
यही है खेल सारा अक्षरों का।

बह्र–1222 1222 122

काफिया—ओं  //रदीफ—-  का

रेनू सिंह जादौन

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