एक वंदन, वाल्मीकि को!!(आज के दिन विशेष)

0
493

एक वंदन, वाल्मीकि को

तमसा के तट उभरी
एक ऋषि की पीड़…
ऐसा व्याकुल हो उठा
जैसे..चुभा हो उसको तीर
क्रौंच खगों की रति-क्रीड़ा
सुखासन में लीन
किसी व्याध के बाण ने
लम्हे लिए थे छीन…
रत्नाकर के हृदय की
संवेदना उमड़ कर आई…
मादा-क्रौंच की पीड़ा जैसे
उसके ह्रदय समाई …
सरस्वती को साधक मिला…
जिव्हा आन समाई….
आदि-कवि के श्रीमुख से
थी पहली कविता आई…
कोटि कोटि प्रणाम वाल्मीक…
भक्ति तेरी अपार…
महाऋषि ,आपके कारण जाना…
“राम ” को यह संसार…
महाऋषि वाल्मीकि प्रगट दिवस की बधाई!!

राजकुमार ‘राज’अमृतसर

Loading...
SHARE
Previous article*हे शरद के चंद्र*
Next article*शरद पूर्णिमा * (हाइकु)
अचिन्त साहित्य (बेहतर से बेहतरीन की ओर बढ़ते कदम) यह वेबसाईट हिन्दी साहित्य--गद्य एवं पद्य ,छंदबद्ध एवं छंदमुक्त ,सभी प्रकार की साहित्यिक रचनाओं का रसास्वादन करवाने के साथ-साथ,प्रत्येक वर्ग --(बाल ,युवा एवं वृद्ध ) के पाठकों के हिन्दी ज्ञान को समृद्ध करने एवं उनकी साहित्यिक जिज्ञासा का शमन करने हेतु प्रयासरत है। हिन्दी भाषा,साहित्य एवं संस्कृति के विपुल एवं अक्षुण्ण भंडार में अपना साहित्यिक योगदान डालने,समाज एवं साहित्य के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह करने हेतु यह वेबसाईट प्रतिबद्ध है। साहित्य,समाज और शिक्षा पर केन्द्रित इस वेबसाईट का लक्ष्य निस्वार्थ हिन्दी साहित्य सेवा है। डॉ.पूर्णिमा राय, शिक्षिका एवं लेखिका, अमृतसर(पंजाब)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here