शरद ” पूर्णिमा ” चाँद सुहाना ,आसमान ये नीला है।

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शरद ” पूर्णिमा ” चाँद सुहाना ,आसमान ये नीला है।
प्यास बुझा दो मितवा मेरी, पानी तो ज़हरीला है।।
एक बूँद को तरसे प्यासा ,जल बिना सूख गया कुआँ;
जल बिन मछली तड़पे देखो, सागर भी पथरीला है।।
अपने कर्मों से देता अब, सीख सुहानी पंछी भी ;
बूँद-बूँद से घट भर जाए ,ये सब प्रभु की लीला है।।
चोंच नुकीली ज़ोर लगाए, नल भी दे जाता धोखा;
मृगतृष्णा की मानिंद लगता, पानी भी चमकीला है।।
खत्म हो रही युवा जवानी, पशु-पक्षी परदेस गये ;
मुरझाए सब बाग-बगीचे, कण-कण जो रेतीला है।।
सतरंगी पर आसमान में, देखे तो पूछा सबने;
हाथों में है नीर “पूर्णिमा “नैन दिखे क्यों गीला है।।

drpurnima01.dpr@gmail.com

 

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