ज्वार भाटा

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ज्वार भाटा

नैनों की हद तक
फैला अनन्त सागर,
ऊपर आच्छादित पनीला आकाश,
धरती के गले हिल कर हिल्लोर लेता हुआ
क्षितिज पर मुस्काता,मन को भाता ।
सागर लहरों का मन्द मधुर शोर
हर बार, क़रीब तक आकर
परिस्थितियों की रेत से टकराकर
फीकी,मरी मुस्कान सजाये,
अपनी विशालता पर इतराये,
कानों में बेनाम सरगोशी करके
बिजली की चाल से पलट जाता है।
कभी विचार ,लहरें तेज़ होकर
ज्वार भाटा बन,उफनती हैं,
कभी असमंजस के गर्त में शांत होकर गिरती हैं।
भावनाएँ नयन नमक झाग से
पूरित होके ,असीम तमस में
घोर शांत हो बैठने लगती हैं।
जीवन सागर में असंख्य मोड़ ,दलदल,पठार ,
झरने,हरियाली, फल, फूल आते,जाते हैं,
जीवन धारा अनवरत् बहती ही रहती है
बहना ही जीवन।


डॉ.यासमीन ख़ान,मेेेरठ

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