धरा के लाल

0
21

किसान रोये
बहादुर जो सोये
अच्छा ना होये।

गाँधी, लाल थे
हीरे क्या बेमिसाल
निर्भीक चाल।

दिल पे राज
अच्छे विचार करें
राजा बेताज।

अहिंसा,धर्म
संघर्ष गाँधी पंथ
सदा हो कर्म।

किसान पीड़ा
समझे बहादुर
संघर्ष करे।

आज की सत्ता
स्वयं में बड़ा नशा
है लोलुपता।

मारे ,जाते हैं
निर्दोष व निःस्वार्थ
किसकी ख़ता।

धरा के लाल
गाँधी व बहादुर
धैर्य कमाल।


डॉ.यासमीन ख़ान,मेरठ 2-10-2017

Loading...
SHARE
Previous articleभारतमाता के दो महान सपूतों :महात्मा गाँधी और लालबहादुर शास्त्री जी को आज उनके जन्मदिवस पर नमन
Next articleगरीबों की दुआ, जो हो जाये कुबूल!!
अचिन्त साहित्य (बेहतर से बेहतरीन की ओर बढ़ते कदम) यह वेबसाईट हिन्दी साहित्य--गद्य एवं पद्य ,छंदबद्ध एवं छंदमुक्त ,सभी प्रकार की साहित्यिक रचनाओं का रसास्वादन करवाने के साथ-साथ,प्रत्येक वर्ग --(बाल ,युवा एवं वृद्ध ) के पाठकों के हिन्दी ज्ञान को समृद्ध करने एवं उनकी साहित्यिक जिज्ञासा का शमन करने हेतु प्रयासरत है। हिन्दी भाषा,साहित्य एवं संस्कृति के विपुल एवं अक्षुण्ण भंडार में अपना साहित्यिक योगदान डालने,समाज एवं साहित्य के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह करने हेतु यह वेबसाईट प्रतिबद्ध है। साहित्य,समाज और शिक्षा पर केन्द्रित इस वेबसाईट का लक्ष्य निस्वार्थ हिन्दी साहित्य सेवा है। डॉ.पूर्णिमा राय, शिक्षिका एवं लेखिका, अमृतसर(पंजाब)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here