और रावण जल उठा:डॉ.सुमन सचदेवा “वही रावण जलाये ,जो स्वयं राम है”दशहरा-विशेषांक2017

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और रावण जल उठा:डॉ.सुमन सचदेवा

दशहरे के त्योहार वाले दिन रामलीला ग्राउंड में रावण,कुंभकरण एवं मेघनाद के तीन विशाल बुत खड़े थे । अभी कुछ ही देर में शहर के एक प्रतिष्ठित व्यक्ति द्वारा उन बुतों को आग लगाने की रस्म अदा होनी थी। शहर के कुछ अन्य गणमान्यों द्वारा भाषण दिए गये जिनमें रावण की बुराइयों व श्रीरामचन्द्र जी के सच्चरित्र का बखान किया गया। तत्पश्चात् जनता की तालियों के बीच नेता जी रावण के बुत को अग्नि देने के लिए उठे।

ज्यों ही आग लगाने के लिए उनका हाथ आगे बढा तो बुत से आवाज़ आई–” ठहरो ! तुम कौन होते हो मुझे जलाने वाले ? मैने तो केवल एक गुनाह किया था सीता का अपहरण करने का,मगर मैने अपनी मर्यादा को कभी नही लांघा और मेरी लंका में सीता पवित्र ही रही । मैने जीवन भर और कोई गुनाह नही किया । तुम अपने चरित्र में झूठ,फरेब ,कपट, ईर्ष्या, अश्लीलता,क्रूरता आदि लाख बुराइयां लेकर मुझ एक बुराई को जलाने चले हो। मेरे दस मुख बाहर तो थे ,मगर तुम इस उज्ज्वल चेहरे की ओट में कितने घिनौने चेहरे छुपा कर बैठे हो ,वो बाहर लाओ और फिर मुझे जलाओ । क्या हो तुम मर्यादा पुरुषोत्तम राम ? तो लो मेरे दस सिर उपस्थित हैं । ”

नेता जी के आगे बढे हुए हाथ कांपते हुए वापस मुड चुके थे और वह उस बुत को आग लगाने का साहस नही कर पाए । आत्मग्लानि के कारण अब उनके अंदर का रावण धू – धू कर जलने लगा था ।

डाॅ.सुमन सचदेवा,मलोट,मुक्तसर

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