विजय दशमी:बलविंदर अत्री ” वही रावण जलाये जो स्वयं राम है ” (दशहरा –विशेषांक 2017)

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विजय दशमी:बलविंदर अत्री

राम लीलाओं का अंत
चरम सीमा पर था
भीड़ में था
अज़ब सा जोश
अज़ीब -सा शोर
पर
बारूद भरा होने के बावजूद
भीड़ के बीचों बीच
चुपचाप
लाचार असहाय खड़े थे
रावण कुंभकर्ण और मेघनाद

घमासान युद्ध जारी था
राम रावण का दहन करने को था
कि अचानक बिजली चमकी
बादल गरजे
और बरसे भी
भीड़
तीनों को अकेला छोड़
एक दूसरे को रोंद
भागने लगी
किसी आश्रय की तलाश में
पर मैं
चुपचाप निहारता रहा
वर्षा से भीगते
उनके भीतर के बारूद को—–

आप कहेगें
कि मैं न जाने क्या सोच रहा हूँ
अगर आप
उस वक़्त मेरी जगह होते
तो महसूस करते
कि यह महज़ बारिश नहीं थी
एक चेतावनी थी
क्योंकि बुराई का प्रतीक रावण
नहीं चाहता बार -बार मरना
अपने जैसे लोगों के हाथों

वैसे भी अब राम भक्त
रावण का सामना करने से कतराते हैं
तभी तो अब -दूर से ही
रिमोट कन्ट्रोल से रावण को जलाते हैं!!

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1 COMMENT

  1. एक बेहतरीन कविता जो सामयिकता की धरा पर आधारित है…कटु सत्य..आ.बलविंद्र जी

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