वही रावण जलाये,जो स्वयं राम है:डॉ.पूर्णिमा राय ” वही रावण जलाये जो स्वयं राम है ” (दशहरा–विशेषांक 2017)

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1)वही रावण जलाये,जो स्वयं राम है:डॉ.पूर्णिमा राय

वही रावण जलाये,जो स्वयं राम है।
हृदय का भ्रम मिटाये,राम का नाम है।

R–रसिक वृत्ति से लंकेश का पतन हुआ
A–अभिमानी ,कपटी व धूर्त माना गया
V–विवेकहीन एवं व्यभिचारी कहलाया
A–अहम् में लिप्त होकर ज्ञान का विनाश हुआ।
N–नश्वर एवं क्षणभंगुर संसार की माया समझा गया।

आज दशहरा है ।एक मुख और दस सिर वाले रावण का वध करने का दिन है।यह सर्वविदित है कि आज उसे राम जोकि एक पूर्ण पुरुष ,चरित्रवान,मर्यादा पुरषोत्तम हैं,वही उसे मौत के घाट उतारेंगे।अब तो यह स्थिति है कि जो पकड़ा गया वह चोर है यानि रावण है जो पकड़ता है वह साधु है ,राम है ।”अठन्नी का चोर”कहानी में उपन्यास सम्राट मुँशी प्रेमचंद जी ने यही बताया है कि जिसका अपराध साबित हो या न हो ,अगर वह पकड़ा गया तो वह अपराधी माना जायेगा,उसे दण्ड भी मिलेगा,फिर चाहे चोरी अठन्नी की ही हो।सफेदपोश व मुखौटों वाले चोर यानि रावण किसी को नज़र नहीं आते ।वह तो अपनी दाल गलाने में लगे रहते हैं मतलब अपनी बुराई को ,अपनी बुरी भावना को नोटों के द्वारा अच्छाई का लिहाफ पहना लेते हैं ,और कहलाते हैं दीन दुखियों के राम !!
त्रेतायुग में दशरथ सुत श्रीराम ने अपनी अर्धांगिनी जनक पुत्री सीता मैया पर कुदृष्टि डालने एवं उनका अपहरण करके जघन्य अपराध करने वाले महाज्ञानी ,पण्डित एवं विद्वान लंकेश रावण को मार कर बुराई का नाश किया और अच्छाई को सिद्ध किया था। विभीषण द्वारा अपने भ्राता रावण के मृत्यु का रहस्य नाभि में तीर मारना श्रीराम के समक्ष बता देना क्या उचित था??और बदले में भगवान राम द्वारा उसे लंका का राजपाठ दिलवाना कहाँ तक तर्कसंगत था। सीता मैया का धरती में समा जाना ,यह क्या था।बाल्मीकि आश्रम में लवकुश का जन्म होना,अश्वमेघ यज्ञ का घोड़ा पकड़ना,पुत्रों का भगवान राम जोकि उनके पिता थे,के साथ युद्ध होना!!सब बिन्दु सोचने पर मजबूर करते हैं ।
यह तो अपनी-अपनी भक्ति एवं मर्यादा है कि कौन किसका पक्ष देता है ??न्याय अन्याय क्या है??जो इतिहास में लिख दिया गया ,वह सत्य है तो उसकी सत्यता का प्रतिशत कितना है ??जैसे आज राम रहीम
के समर्थक एवं उसके अनुयायी अभी तक यह मान नहीं रहे कि उनके बाबा भ्रष्ट हैं,उन्होनें अपने भक्तों की भावना से खिलवाड़ किया है ??जहाँ हम श्रीराम को अच्छाई ,सत्यता हेतु दशहरे पर पूजते हैं और रावण को जलाते हैं वहीं लंका में लोग रावण को पूजते हैं।
एक भेड़चाल सी बनी लगती है।जब हम भी छोटे थे,बाल्यावस्था में थे,सभी बच्चे पाँच पाँच दस रुपये एकत्र करते थे ।छोटा सा रावण बनाया जाता था।उसमें छोटे-छोटे पटाखे रख दिये जाते थे।तब भी दशहरा पर अवकाश होता था और आज भी ।अवकाश का आनंद वैसा ही है जैसा बचपन में होता था,फर्क यह है कि तब पढ़ते थे ,अब पढ़ाते हैं।खैर सारा दिन ज्यों नाशता करके छोटे से खुले मैदान में सब बच्चे आ जाते थे और दोपहर तक टेढा-मेढा रावण बन ही जाता था। फिर इंतजार रहता था,स्टैंडर्ड टाईम चार बजे का!!शायद इस चार बजे से इतना मोह क्यों है ,यह मोह आज भी बरकरार है।तब यह रावण जलाने का समय होता था और आज चाय की चुस्की लेने का।चार बजते ही होशियार बच्चा रावण को आग लगाता था और तेजी से पीछे भागते-भागते कई बार गिर भी जाता था।कुछ सैंकिड में धूँ-धूँ करके हम बच्चों का रावण तो जल जाता था मगर अमृतसर शहर के गोल बाग में बने बड़े से रावण के जलने पर पटाखों की विभिन्न ध्वनियाँ रात तक कानों में गूँजती रहती थी।बस यही पढा था और यही पढ़ाया था शिक्षकों ने कि सत्य की जीत हुई और झूठ की हार!रावण मरा,बुराई मरी!राम आये ,भलाई आई!!
!यह भारतीय संस्कृति ही है जो नैतिक मूल्यों को जीवंत रख रही है ।यह सभी उत्सव , पर्व संस्कृति के रक्षक हैं,पोषक हैं ।
आज जब सोचती हूँ तो कई सवाल उठते हैं मन में !
पारंपरिक संदर्भ में पर स्त्री पर कुदृष्टि डाली थी तो दशहरा पर्व बन गया।आज सामयिकता में यह लिव इन रिलेशनशिप नाम आ गया,इसको पूरा समर्थन मिला है।थर्ड जैंडर को कानूनी तौर पर मान्यता मिली ,गौरी सुरेश सावंत एक बेटी को गोद लेकर पाल रही हैं ।नारी शिक्षा व समानता कानून बने,बाल मजदूरी रोकने हेतु कार्य हो रहे,बाल विवाह ,विधवा विवाह ,पर्दा प्रथा,सती प्रथा,दहेथ प्रथा संबंधी धारणायें बदली हैं।फिर हम एक ही रावण को हर साल मारते हैं जलाते हैं,पर वह न तो मरता है न ही जलता है ,क्यों??अर्थ स्पष्ट है,हम सिर्फ श्रीराम का मुखौटा पहनते हैं और बनावटी रावण के पुतले को जलाते हैं।
असली रावण त्रेतायुग में मरा था तो पिर आज कलयुग में वह कैसे आ गया??

सोलह कला संपूर्ण तो शायद भगवान भी न हुये होंगें।फिर हरेक इन्सान में गुण-अवगुण तो निश्चित रूप से दिखेंगे ही !!आज विभिन्न रूपों में रावण उत्पन्न हो गया है ।देश में व्याप्त समस्याएं- –मँहगाई,बेरोजगारी ,भ्रष्टाचार ,रिश्वतखोरी भी रावण का ही रूप हैं जो हमें समाप्त करनी हैं ।हम सब चाहते हैं,इनसे निजात मिले !!पर बात फिर वही ..दूसरों के लिये मानवीय मूल्यों के भाषण है,लैक्चर हैं,खुद के अमल के लिये नहीं!!अपना कोई कार्य पूर्ण न हो रहा हो तो दिखाते हैं बाबुओं को दो हजार का नोट फटाफट!!हास्यास्पद स्थिति उत्पन्न हो जाती है ,तब लगता है हमसे समझदार तो कोई है नहीं,बेवकूफ है दूसरा बंदा…पैसे नहीं दिये तो अब लगा रहा चक्कर दफ्तरों के !! मन का रावण मरता ही नहीं,क्या किया जाये??शार्टकट से जो आगे बढ़ना सबको,तो भाई मरेगा कैसे??दूसरों की टांग मत खींचो बल्कि अपनी टांग से छलांग जरा और बढ़ी लगा लो !!फिर राम बनोगो रामलीला में तो लोग जूते नहीं मारेंगे ,सलाम करेंगें!!आज वह देहधारी रावण के दस सिर —भ्रष्ट नेता,वकील,अध्यापक,डाक्टर,दुकानदार, ढोंगी साधु व धर्म के ठेकेदार, न्यायधीश व पुलिस,फिल्मी जगत के लोग तथा आम जनता इत्यादि के रुप में अजगर की तरह फन फैलाकर घूम रहे हैं।
सौ प्रतिशत श्रीराम की भूमिका वही निभायेगा जिसकी चोरी पकड़ी नहीं जायेगी और जो पकड़ा गया वह रावण बनकर आग में धुआँ-धुआँ हो जायेगा।।कोई बड़ा रावण तो कोई छोटा रावण ,पर आज रावण सब के भीतर है,राम भी सबमें समाया हुआ है ,उसका अस्तित्व दब गया है –भोलाराम के जीव की तरह दफ्तरों की फाईलों में! रावण को मारें ,जलायें ,पर लंकेश रावण को नहीं ,अपने भीतर छिपे हुये रावण को ,ताकि एक स्वस्थ एवं स्वच्छ भारतीय संस्कृति और सभ्यता की अमूल्य धरोहर भावी पीढ़ी को विरासत में दे सकें।

अन्त में यही कहूँगी——
भीतर के रावण को जो,आग खुद लगायेंगे ।
सही मायनों में वे ही ,दशहरा मनायेंगे।।
छिप कर बैठा ये दानव ,आज हर एक दिल में      भड़काता वैर की आग, हँसते-खेलते घरों में, 
कलुषित मनोवासना को ,जो सदा मिटायेंगे। 
सही मायनों में वे ही ,दशहरा मनाएंगे….।
मन रावण फुंकार करे ,रक्त अपनों का बहे 
मूली गाजर के जैसे ,मानव आज कट रहे 
दया धर्म सद् भावों के,जो दीप जलायेंगे। 
सही मायनों में वे ही ,दशहरा मनाएंगे….।
मनाता है रंगरलियां ,ये काँटे बिखेरकर 
दिखाता झूठे पंख है ,ये सत्य समेटकर
चुनकर काँटे राहों के,जो फूल बिछायेंगे।। 
सही मायनों में वे ही ,दशहरा मनाएंगे….।
धन-वैभव की इच्छा से, सराबोर रहता हर पल 
बुद्धि ज्ञान को बिसराये, दुष्कर्म करे हरपल       “पूर्णिमा”मरे जमीर को जो ,सचेत कर पायेंगे।
 सही मायनों में वे ही ,दशहरा मनायेंगे….।

 

डॉ.पूर्णिमा राय,
शिक्षिका,लेखिका,संपादिका
अमृतसर( पंजाब)
drpurnima01.dpr@gmail.com

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