आई वैशाखी by Dr.Purnima Rai

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आई वैशाखी

1* ललित छंद–

पावन बेला वैशाखी में ,
फसलें पक जाती हैं।
दृश्य मनोरम देख-देख के ,
चिड़ियाँ मुस्काती हैं।।

जन आनंदित दिखें सभी अब,
चाह हृदय उठती है।
कृषकों की हालत सुधरे बस,
यही दुआ करती है।।
2*चौपइया छंद

आई वैशाखी,
उड़ते पाखी,
फसलें भी लहराएं।

रोम-रोम पुलकित,
मनवा हर्षित,
सबको साथ नचाएं।।

निर्मल मनभावन,
सजता आँगन,
मिलकर जश्न मनाएं ।।

पंजाब हमारा,
सबसे न्यारा,
जग को आज दिखाएं।।

कुण्डलियाँ छंद
(1)
हालत देख किसान की,नेत्र बहाते नीर।
खाने के लाले पड़े ,नहीं बदन पर चीर।।
नहीं बदन पर चीर, हुई चमड़ी है काली।
सहता है वह दुःख ,देखकर मटके खाली।।
बरसेंगे जब मेघ,मिलेगी तब ही राहत।
मनभावन बरसात,सुधारेगी ये हालत।।

(2)
रोती आँख किसान की,देख फसल का हाल
क्या काटे क्या बेच दे,कैसे गुजरे साल
कैसे गुजरे साल,दिलों का हाल छिपाते
भूखे बच्चे साथ,पिता को धैर्य बँधाते
कहे पूर्णिमा” राज़ ,उगें श्रम दम से मोती
सही मिलेगा दाम,आँख फिर क्यों है रोती।।

– डॉ.पूर्णिमा राय,अमृतसर।

drpurnima01.dpr@gmail.com

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