निर्भया का भय(डॉ.चन्द्रा सायता)

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              निर्भया का भय

रंजन, सुलेमान, महेश और मनजीत चारों दोस्त एक सुनसान जगह पर बनी झोंपड़ी के बाहर आकर रुक गये। उन्होंने अपनी बाईक एक तरफ खडी़ कर दी और किसी विषय पर मंत्रणा में लग गए। तीन दोस्तों ने आंखों से संकेत करते हुए महेश को झोंपड़ी के अंदर जाने को कहा। थोड़ी बहुत ना नुकुर करने के बाद वह अंदर जाने को राजी हो गया।

     अंदर जाने पर उसनेे जिस युवती को देखा, उसके दोनों हाथ बंधे हुए थे। मुँह दुपट्टे से सील किया हुआ था। दुपट्टे के दोनों छोरों से गर्दन को लपेटते हुए पीछे की दीवार में लगी खूंटी से बांध दिया था।

           युवती विवश आंखों से याचना कर रही थी। कुछ बोलने की कोशिश भी कर रही थी।स्वर स्पष्ट नहीं था।महेश कुछ देर सोचता खडा़ रहा, फिर पीछे की खिड़की से कूदकर भाग गया।

 पन्द्रह – बीस मिनट बाद भी जब महेश वापस नहीं आया, तो सुलेमान को अंदर भेजा गया।

     सुलेमान को अंदर के सुनियोजित दृश्य में जरा भी परिवर्तन नहीं दिखा।उसका माथा ठनका।वह बड़बड़ाने लगा। हाथ आया मौका यूंही गंवाकर चला गया।

          इतने में सुलेमान की निगाह युवती की देह पर पड़े मुडे़- तुड़े काग़ज के पुर्जे पर पड़ीं।

उसने कागज उठाया ,सीधा करके पढ़ने लगा।  ” मैं फांसी नहीं चढ़ना चाहता। कुछ क्षणों का सुख और उसकी इतनी बड़ी कीमत- सरासर बेवकूफी है।”

       सुलेमान सब कुछ समझ चुका था। उसने भी महेश का ही अनुसरण किया।

            काफी समय बीतने तक जब महेश और सुलेमान बाहर नहीं आए तो रंजन और मनजीत एक साथ अंदर गए।

 वही कागज का टुकड़ा अब युवती के चेहरे पर पड़ा हुआ  फड़फड़ा रहा था।। युवती अन्तर्मन में उठ रहे झंझावात के कारण बेसुध हो चुकी थी।कागज के उस टुकड़े का लिखा हुआ पढ़ते ही दोनों ने एक दूसरे की ओर देखा। दोनों ही तत्काल झोंपड़ी से बाहर आ गए।

        मामले की गम्भीरता शायद उन्हें समझ में आ चुकी थी ।उनके सामने कल का पढा़ समाचार आ गया।

    ” निर्भया के बलात्कारियों कातिलों की सजा सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखी।”      

                

  डॉ चन्द्रा सायता

 19श्रीनगर कालोनी (, मेंन),

इंदौर 452018 मो.93296316

ई मेल :-chandrasayata@ yahoo.in

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