सच्चे कर्मशील(प्रमोद सनाढ्य)

0
116

 सच्चे कर्मशील

वो
पूछ रहे थे
पता “फरिश्तों” का,
जो “कर्म”
चुपचाप
“धर्म” का करते है।
सिर्फ
“रब”होता है
जिनके इस “धर्म”
का
“गवाह”
या वो “कर्म”
जो
कभी
परिपूर्ण हो
फैलाता है जग मे
किये गये
निस्वार्थ
“सेवा धर्म”
के “प्रकाश” की
किरणों को
तब
जुड़ जाता है
अनायास ही उस
“प्रकाश पुंज”
के साथ इन
अस्ताचल की ओर बढ़ती
“ऋचाओँ”
की रोशनी का नाम भी
जिन्होने कभी
स्वयं जल कर किया था
रोशन
“इस जहाँ “को
“रोशन”
ऐसे कर्मशील धर्मी
ही होते हैं
सच्चे
“फरिश्ते”
जिन्हें हम
ये जग और
ये जहाँ
कहता
“माता-पिता”

प्रमोद सनाढ़्य
राजसमन्द

Loading...
SHARE
Previous articleदादी की रोटी (जियाउल हक)
Next articleधन वैभव:दोहे साधक के
अचिन्त साहित्य (बेहतर से बेहतरीन की ओर बढ़ते कदम) यह वेबसाईट हिन्दी साहित्य--गद्य एवं पद्य ,छंदबद्ध एवं छंदमुक्त ,सभी प्रकार की साहित्यिक रचनाओं का रसास्वादन करवाने के साथ-साथ,प्रत्येक वर्ग --(बाल ,युवा एवं वृद्ध ) के पाठकों के हिन्दी ज्ञान को समृद्ध करने एवं उनकी साहित्यिक जिज्ञासा का शमन करने हेतु प्रयासरत है। हिन्दी भाषा,साहित्य एवं संस्कृति के विपुल एवं अक्षुण्ण भंडार में अपना साहित्यिक योगदान डालने,समाज एवं साहित्य के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह करने हेतु यह वेबसाईट प्रतिबद्ध है। साहित्य,समाज और शिक्षा पर केन्द्रित इस वेबसाईट का लक्ष्य निस्वार्थ हिन्दी साहित्य सेवा है। डॉ.पूर्णिमा राय, शिक्षिका एवं लेखिका, अमृतसर(पंजाब)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here