वो चले गये (ज्योति श्रीवास्तव)

2
136

वो चले गये !

वो चले गये
कुछ यादें साथ लेकर
कुछ यादें हमें देकर
देखो वो चले गये।
जरा सा मुस्कुराकर हँसकर
हमारी आँख में आँसू भरकर
ऐसे वो चले गये।
रोकने गये हम खुद चलकर
तेज धूप की आग में जलकर
फिर भी वो चले गये।
इतने दिनों के बाद मिलकर
कुछ दिन न मिलेंगे कहकर
कैसे वो चले गये।
आरजू पूरी की हमने शरमाकर
बड़ी मुश्किल से घबराकर
लेकिन वो चले गये
बेबस थे और भी बेक़रार होकर
हमें रुलाक़े और खुद रोकर
आखिर वो चले गये।
अब याद आते है वो रह-रहकर
घुट रही हूँ वो यादें सह-सहकर
आखिर वो चले गये।

श्रीमती ज्योति श्रीवास्तव
सहायक अध्यापक
P/s khireti

Loading...
SHARE
Previous articleमन अंदर है गहन अँधेरा -*त्वं शरणं मम* (सुशील शर्मा)
Next articleपतंग और पेड़ (राजकुमार ‘राज’)
अचिन्त साहित्य (बेहतर से बेहतरीन की ओर बढ़ते कदम) यह वेबसाईट हिन्दी साहित्य--गद्य एवं पद्य ,छंदबद्ध एवं छंदमुक्त ,सभी प्रकार की साहित्यिक रचनाओं का रसास्वादन करवाने के साथ-साथ,प्रत्येक वर्ग --(बाल ,युवा एवं वृद्ध ) के पाठकों के हिन्दी ज्ञान को समृद्ध करने एवं उनकी साहित्यिक जिज्ञासा का शमन करने हेतु प्रयासरत है। हिन्दी भाषा,साहित्य एवं संस्कृति के विपुल एवं अक्षुण्ण भंडार में अपना साहित्यिक योगदान डालने,समाज एवं साहित्य के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह करने हेतु यह वेबसाईट प्रतिबद्ध है। साहित्य,समाज और शिक्षा पर केन्द्रित इस वेबसाईट का लक्ष्य निस्वार्थ हिन्दी साहित्य सेवा है। डॉ.पूर्णिमा राय, शिक्षिका एवं लेखिका, अमृतसर(पंजाब)

2 COMMENTS

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here