चुरा कर दिल बडा़ नाज़ुक बताओ तो किधर रक्खा।

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ग़ज़ल

सुहानी भोर को चूनर उढा़ कर इस कदर रक्खा।
खिली सी धूप से रेशम चुराकर बस असर रक्खा।

लगाये फूल थे जिसमें वही बस प्रेम की बगिया,
उजाड़े गा चमन वो ही नहीं ऐसा शज़र रक्खा।

महकती याद सीने मे जलाती मन मगन हर पल,
तुम्हारी याद को दुल्हन बनाकर इस कदर रक्खा।

पुकारू किस तरह तुमको समझ आता नहीं अब तो,
तभी तो धड़कनों के साथ सांसों का गजर रक्खा।

गुजारा भर सही लेकिन तुम्हारा प्यार बस मेरा,
उसी से बस निभाया है कमी में भी बसर रक्खा।

बताओ क्या कहूँ तुमको बिठाऊँ किस जगह दिल मे,
चुरा कर दिल बडा़ नाज़ुक बताओ तो किधर रक्खा।

नहीं तेरा नहीं मेरा सताया हर घड़ी जिसने,
समय कैसा हुआ जालिम हमीं ने ही सबर रक्खा।

संगीता पाठक,सहारनपुर

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