पिंडदान

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पिंडदान (लघुकथा)

अरे सुधीर तुम यहाँ ?
सब ठीक तो हैं ना ?
अचानक सुधीर को यू पिंडदान करते देख चौंक पड़ा विमल । पूछे बिना न रह सका पर पंडित जी के उच्च स्वर में मंत्रोंच्चारण ने खामोश रहने का इशारा कर दिया । सो चुप हो गया पर माता पिता के पिंड दान के पश्चात पूजा समाप्त कर सुधीर के निकट गया । कंधे पे हाथ रख पूछा सब ठीक तो हैं तुम किसका पिंडदान करने आये थे । चाचा चाची तो ठीक हैं ना ? अभी तो कुछ दिन पहले ही उन्हें देखा था बिल्कुल ठीक थे ? क्या हुआ अचानक ?

अनमना सा सुधीर बोला छोड़ ये सब पहले ये सुन मेरी नौकरी अमेरिका में लग गयी और सारी तैयारियाँ भी हो गयी जाने की परसों निकलना हैं । अरे वाहहहहह ! ये तो बहुत अच्छी बात हैं बधाई हो यार ।

पर …….!
अरे जानता हूँ क्या पूछना चाहते हो । सब ठीक हैं माँ भी और पिताजी भी । तो फिर तू ये सब ….गले में फँस कर रह गयी आवाज कुछ पूछता उससे पहले बोला सुधीर ।
माँ पिताजी को वृद्धाआश्रम छोड़ आया हूँ आज नहीं तो कल पिंडदान तो करना ही था फिर अमेरिका जाने के बाद वहाँ से वापस आना वो भी एक पिंडदान के लिए । उफ ।
झमेला ही खत्म कर दिया आज कौन आये जाये और पैसे बरबाद करे फिर बच्चें व शोभा को भी तो देखना हैं । अपनी रौ में बोलता सुधीर ये भी न भांप पाया कि कब उसने अपने जिगरी दोस्त को खो दिया । विमल आगे बढ़ गया व ये देख हतप्रभ रह गया कि कौओं का झुंड भी सुधीर के पिंड को झूठा करने नहीं आया था शायद वो भी भांप गये थे उस पिंड की सच्चाई व सुधीर के आने वाले वीभत्स कल को ।

रुबी प्रसाद
सिलीगुड़ी

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