हिन्दी भाषा:भावात्मक एकता की आधारशिला(डॉ.पूर्णिमा राय)हिन्दी दिवस14सितंबर2017     

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हिन्दी भाषा : भावात्मक एकता की आधारशिला 
                     (डॉ.पूर्णिमा राय,अमृतसर )
किसी राष्ट्र की एकता व संस्कृति के शक्तिशाली बनने का माध्यम भाषा है। भाषा के उत्थान एवं प्रचार में ही पूरे राष्ट्र का कल्याण समाहित है।मातृभाषियों की सँख्या की दृष्टि से विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं के सन् 1998 ई. के उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार हिन्दी को तीसरा स्थान दिया गया।सन् 1997 में सैन्सस ऑफ इण्डिया का भारतीय भाषा ओं  के विश्लेषण का ग्रन्थ प्रकाशित हुआ। संसार की भाषाओं की रिपोर्ट तैयार करने के लिए यूनेस्को द्वारा सन्1998 में यूनेस्को प्रश्नावली भारतीय सरकार के केंद्रीय हिन्दी संस्थान के तत्कालीन निदेशक प्रोफैसर महावीर सरन जैन को भेजी गई।जिस आधार पर यह विश्व स्तर पर स्वीकार्य है कि  मातृभाषियों की सँख्या की दृष्टि से हिन्दी का स्थान संसार की भाषाओं में द्वितीय है।

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चमके है बिंदी सदा ,सुन्दर भाल नारी के
बनी देश भारत की,पहचान हिंदी से।।
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विश्व के लगभग 20वीं शती के अंतिम दो दशकों में हिन्दी का अंतर्राष्ट्रीय विकास बहुत तेज़ी के साथ हुआ है।वेब,विज्ञापन ,संगीत,सिनेमा और बाज़ार के क्षेत्र में हिन्दी भाषा की माँग दिन प्रति दिन बढ़ती  जा रही है।विश्व के लगभग 150विश्वविद्यालयों तथा सैंकड़ों छैटे बड़े केंद्रों में विश्वविद्यालय स्तर से लेकर शोध स्तर तक हिन्दी के अध्ययन -अध्यापन की व्यवस्था हुई है।आज हिन्दी में सजाल website, चिट्ठे, Blog, विपत्र Email , गपशप Chat , खोज WebSearch ,सरल मोबाइल संदेशSMS  तथा अन्य हिन्दी सामग्री उपलब्ध है जिस कारण हिन्दी भाषा का प्रचार प्रसार  का फलक  विस्तृत हुआ है।
भारत के स्वतंत्र होने पर  देश की संविधान परिषद् ने 14 सितंबर ,1949 को हिन्दी को राष्ट्र भाषा के रुप में  और देवनागरी लिपि को राष्ट्र लिपि के रुप में स्वीकृति प्रदान की।26 जनवरी1965को संविधान के अनुच्छेद 343 के अंतर्गत हिन्दी को संघ की राजभाषा  घोषित कर दिया गया।हिन्दी भाषा में राष्ट्र भाषा के सभी गुण पाए जातें हैं।ये सरल,सुबोध एवं नवीन शब्दों के निर्माण की क्षमता से युक्त है।इसकी लिपि वैज्ञानिक एवं सरल है।यह भाषा देश की भावात्मक एकता बनाए रखने की अदम्य क्षमता से परिपूर्ण है।

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बोले सदा वाणी यही ,जय-जयकार हिंदी
भाषा उपभाषा को भी, मिले मान हिंदी से।।
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भाषा शास्त्र की दृष्टि से हिन्दी उस भू भाग की भाषा है जिसे प्राचीनकाल में मध्य प्रदेश अथवा अंतर्वेद कहते थे।इसमें अरबी फारसी के शब्दों को स्वीकार किया जाता है ।इसका मानक रुप स्थापित करने के लिए भारत सरकार ने कई कोश तैयार करवाए हैं।विशेषकर पारिभाषिक शब्दावली का निर्माण करने के उपरांत हिन्दी का एक मानक रुप स्थापित हो गया है।खड़ीबोली ही हिन्दी ,उर्दू ,हिन्दुस्तानी का मूलाधार है।जब इसमें संस्कृत के तत्सम शब्दों का व्यवहार होने वाला है तब वह हिन्दी कही जाती है।जब उर्दू फारसी शब्दों का प्राधान्य हो तब वह उर्दू कही जाती है।
पुरानी हिन्दी ,उर्दू और अंग्रेज़ी के मिश्रण से जो एक
नई ज़ुबान  अपने आप बन गई है,उसको हिन्दुस्तानी कहते हैं । खड़ीबोली की रुपगत उल्लेखनीय  विशेषता उसका अत्यधिक विश्लेषणात्मक होना है।संज्ञा रुपों में वह इतनी विश्लेषणात्मक है कि इसमें कर्ता तथा तिर्यक दो प्रकार के रुप  उपलब्ध होते हैं।इस तिर्यक रुप में विभिन्न उपसर्ग लगाकर इसके अन्य कारकों के रुप संपन्न होते हैं।
इसमें  कर्तारि,कर्मणि,भावे तीनों प्रकार के प्रयोग मिलते हैं।इसमें वास्तव में एक ही काल समभाव्य वर्तमान का प्रयोग मिलता है।खड़ीबोली में अनुसर्ग रुप में ” में ” का प्रयोग होता है।इसमें एकापरांंत पुल्लिंग तदभव शब्दों के रुप तिर्यक एक वचन तथा कर्ता बहुवचन में ” ए ” प्रयुक्त करने से संपन्न होते हैं। इसी प्रकार तिर्यक बहुवचन रूपों में अन् प्रत्यय लगता है।
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हिंदी भाषा सीधी-सादी, मीठी बोली बड़ी प्यारी
धरोहर संस्कृति का, मिला ज्ञान हिंदी से।।
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हिन्दी भाषा की लिपि देवनागरी लिपि है जिसका संबंध ब्राह्मी लिपि से है ।प्राचीन भारत में ब्राह्मी और खरोष्ठी दो लिपियों का प्रचार था । ब्राह्मी लिपि राष्ट्रीय लिपि थी जो बांई ओर से दाहिनी ओर लिखी जाती थी। खरोष्ठी ( गधे के होंठ वाली )लिपि फारसी लिपि की तरह दाहिनी ओर से बाईं ओर लिखी जाती थी।देवनागरी शब्द की व्युत्पत्ति ” नागर ब्राह्मण “, “नगर “,  “देवनगर ” से मानी जाती है।दक्षिण में संस्कृत की पुस्तकें नागरी लिपि में भी लिखी जाती थी जो
” नन्दि नागरी ” के नाम से प्रसिद्ध हैं।

             देश के कई भागों में हिन्दी  मातृभाषा  नहीं,
वरन् इतर भाषा है। राष्ट्र भाषा के कारण अहिन्दी भाषी प्रान्तों में इसकी शिक्षा का महत्व स्वतः सिद्ध है ।हिन्दी शिक्षण अहिन्दी भाषी प्रांतों में एक जटिल समस्या है।इतर भाषा के रुप में हिन्दी की शिक्षा एक विचारणीय समस्या है।राष्ट्रभाषा  हिन्दी का स्वरुप व धरातल अधिक व्यापक हैजो प्रादेशिक भाषा हिन्दी से अलग है।जो विविधता अभिव्यक्ति एवं शब्दावली में दीखती है ,वह राष्ट्रभाषा की विशेषता है।पंजाब की हिन्दी उत्तप्रदेश की हिन्दी से भिन्नता रखती है,ऐसा कहना उचित नहीं ।हिन्दी भाषा में ग्रहण एवं स्वीकार्य का भाव है।वह मुहावरों ,वाक्य विन्यास ,विचारों के रुप में अन्य भाषाओं से ग्रहण करती है एवं अपने भाषा धरातल को समृद्ध करती है। पंजाब में हिन्दी भाषा चौथी कक्षा से शुरु की जाती है ।भाषा वैज्ञानिक एवं शिक्षा शास्त्री इस बात से सहमत हैं कि इतर भाषा की शिक्षा छोटी से छोटी  अवस्था में दी जानी चाहिए।दस वर्ष से पहले भाषाएं सीखने में जो नैसर्गिक सुविधा रहती है,वह बाद में नहीं होती।
हिन्दी क्षेत्र में हिन्दी का उच्चारण नैसर्गिक है परन्तु अहिंदी क्षेत्र में ध्वनि  विषमता पाई जाती है ।उच्चारण का अर्थ के साथ सम्बन्ध है।अशुद्ध उच्चारण अर्थबोध में कठिनाई उपस्थित करता है।थोड़े से उच्चारण भेद से अर्थ बदल जाता है—जैसे–गुण–गुन,पानी–पाणी आदि। भाषा का वर्तमान उच्चारण ग्राह्य है।उच्चारण में स्वतंत्रता बरतने से भाषा में बिगाड़ पैदा हो जाएगा जोकि उचित नहीं।
हिन्दी भाषा का अपना  ध्वनि विचार ,शब्द विचार,वाक्य विचार है जिस कारण अहिन्दी भाषियों के लिए हिन्दी बोलते यां लिखते समय  व्यवधान उपस्थित होता है।हिन्दी के विभिन्न प्रयोग अहिन्दी भाषियों के लिए टेढ़ी खीर के समान है।पंजाबी में स्त्रीवाचक विशेषणों के विशेषणों का लिंग बदल कर पीलियाँ साडियाँ,चंगियाँ गल्लाँ कहा जाता  है।इसी प्रभाववश हिन्दी में पीलियाँ साड़ियाँ,अच्छीयाँ बातें जैसे अशुद्ध प्रयोग देखे जाते हैं।क्रिया रुप जितने हिन्दी भाषा में हैं,उतने अन्य भाषा में नहीं।हिन्दी व्याकरण की जटिलता का निदान अभी तक नहीं हो सका है।अहिंदी प्रान्तों के पास हिन्दी व्याकरण की जटिल पहेलियों को सुलझाने का कोई समर्थ समाधान नहीं है।

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देह में बसी हो हिंदी, दिल में हो धड़कन ,
मिटे भाषा जाति धर्म,व्यवधान हिंदी से।।
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                 अहिन्दी प्रांत पंजाब में जहाँ पंजाबी क्षेत्रीत्र भाषा है वहाँ हिन्दी राष्ट्रीय भाषा दोनों की शिक्षा छात्रों को देने का प्रावधान है।वह अपनी मातृभाषा से भी जुड़े हैं एवं अपनी राष्ट्रीयता को भी हिन्दी भाषा के माध्यम से प्रकट करते हैं।पंजाब के छात्रों के लिए हिन्दी में आगे बढ़ने  एवं व्यवसाय चुनने के विशेष अवसर हैं ।भारत सरकार के विभिन्न कार्यालयों में अलग अलग पदों पर काम करने के लिए मैट्रिक स्तर की हिन्दी अनिवार्य है।CBSE एवं  ICSE में क्षेत्रीय भाषा एवं राष्ट्रीय भाषा में एक का चयन करना होता है।पंजाब में छात्र दोनों भाषाओं के शिक्षण को प्राप्त करके अपने भविष्य को संवार सकते हैं।छात्रों को हिन्दी शिक्षण देकर निम्न व्यवसायों में,पदों पर रोजगार प्राप्त करने की सुविधा प्रदान करवाई जा सकती है।——
1 रक्षा सेवाओं में
2 अर्ध सैनिक बलों में सामान्य ड्यूटी ,तकनीकी सेवाओं में
3 स्टॉफ सिलेक्शन कमीशन की विभिन्न परीक्षाओं में
4 संघ लोक सेवा आयो द्वारा   आयोजित की जाने वाली परीक्षाओं में
5 अनुवादक पद के रुप में केन्द्र सरकार के विभिन्न कार्यालयों में
6 बैंकों में हिन्दी ऑफिसर ,बहु राष्ट्रीय कंपनियों में हिन्दी भाषाधिकारी के रुप में..आदि।

हिन्दी से प्रेम ही सात्विक प्रेम है, हिन्दी से प्रेम ही राष्ट्र प्रेम है।  हिन्दी भाषा के व्यापक धरातल को देखते हुए एवं इसके तीव्रगामी हो रहे प्रचार-प्रसार के मद्देनजर  आओ आज हम हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य पर प्रण करें कि हम हिन्दी भाषा एवं साहित्य के उत्थान व विकास में सदैव अग्रणी रहेंगें।अन्य भाषाओं की मान मर्यादा बरकरार रखते हुए हिन्दी की अमर मशाल के प्रकाश
से विश्व को आलोकित करेंगें।अंत में यही कहना चाहूँगी–
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बनाकर भाव की बाती चलो दीपक जलाते हैं
धरा पर पेड़ हिन्दी के चलो मिलकर लगाते हैं।।
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डॉ.पूर्णिमा राय,अमृृृतसर

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