चीख उठी है स्वयं वेदना

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नन्हे मासूम प्रद्युम्न की बर्बरता से हत्या पर जब लिखने बैठा तो इतना कुछ लिखने को था किन्तु जानता हूँ सिर्फ कविता लिखने से अब वह मासूम नही आ सकता बस उसे इंसाफ मिले और आगे ऐसा कभी न हो इसी कामना के साथ अपनी सम्वेदनाएँ रखता हूँ ….

चीख उठी है स्वयं वेदना, देख क्रूरता के मंजर ।
निष्ठुरता ने मानवता को, मार दिया खूनी ख़ंजर ।

गलियाँ-गलियाँ सुबक रही हैं, वादी-वादी दहशत है ।
सन्नाटों में कहीं चीखता, धरती का दिल आहत है ।

कैसा निर्मम कृत्य हुआ है, मानवता शर्मिंदा है ।
एक फूल को कुचला जिसने, वो हत्यारा जिंदा है ।

इस घटना पर मौसम रोया, रोये दरिया, पोखर भी ।
देर रात तक अम्बर रोया, रोया दूर समंदर भी ।

पत्थर के सीने भी रोये, रोये नर्म सलोने भी ।
घर की छत, दालान, कोठरी, रोये कोने-कोने भी ।

माँ की आंखों के सागर ने, बाँध सब्र के तोड़ दिए ।
और हृदय के तटबंधों ने, लाखों दरिया मोड़ दिए ।

फूट-फूट कर एक पिता का, संयम रोया आंखों से ।
सिसकी भर-भर अहसासों का, मौसम रोया आंखों से ।

जिन हांथो ने नन्हे बचपन, को प्यारी किलकारी दी ।
एक कली को खुलकर खिलने, की पूरी तैयारी दी ।

जिस बेटे की जिद के आगे, सारा घर झुक जाता था 
और समय का पहिया जिसकी, बोली से रुक जाता था 

एक जरा सी सिसकी से ही, कई हृदय फट जाते थे ।
जिसकी आंखों के आंसू भी, बहने से कतराते थे ।

जिसकी बातें गीता जैसी, कभी कुरान सरीखी थीं ।
और बोलियाँ पूजा भी थीं, और अजान सरीखी थीं ।

जिसने घर आँगन को प्यारी-प्यारी सी फुलवारी दी ।
आज उसी ने हाय विधाता, ये कैसी लाचारी दी ।

पल भर में खुशियों का दर्पण, जरा चोट से तोड़ दिया 
और दुखों का दरिया अपनों, के जीवन में मोड़ दिया 

जिसके दुनिया में आने पर, सबने खूब बधाई दी ।
आज उसी को नम आंखों से, सबने मौन बिदाई दी ।

ऐसा दृश्य देखकर पत्थर, भी खुलकर रोये होंगे ।
और सदी के सारे लमहे, पीड़ा में खोए होंगे ।

जिन आंखों ने जिस भविष्य का, स्वप्न सुखद बोया होगा ।
आज उसी के मृत शरीर को, कंधों पर ढोया होगा ।।

जिसने अब तक जीवन के, थोड़े ही सावन देखे थे ।
जिसने इस दुनिया मे केवल, उजले दामन देखे थे ।

उसे नियति ने कैसे इतनी, जल्दी हमसे छीन लिया ।
और सभी के दिल पर ऐसा, घाव एक संगीन दिया ।

कितना निष्ठुर, निर्मम होगा, वह कातिल हत्यारा भी ।
जिसने साजिश रची और नन्हे बच्चे को मारा भी ।

क्या भोले चेहरे पर उसको, जरा तरस आया होगा ।
क्या भोली भाली आंखों ने उसको भरमाया होगा ।

क्या चाकू की नोंक गले के पास जरा ठहरी होगी ।
या उसके अंदर मानवता ही गूँगी बहरी होगी ।

क्या मासूम चीख भी उसके, दिल तक नहीं गयी होगी ।
जाने कैसी हालत दोनों, की उस वक़्त रही होगी ।

स्वाभाविक है उस कातिल की, सोच बहुत विकृत होगी ।
और विषैले साँपों जैसी, ही उसकी फितरत होगी ।

तब ही तो नन्हे बच्चे पर, उसको दया नहीं आई ।
नन्हा सा प्रद्युम्न खड़ा था, और खड़ी थी निठुराई ।

निष्ठुरता ने कोमलता पर, ऐसे तेज प्रहार किए ।
नन्हा सा तन कब तक सहता, प्राण सहज ही त्याग दिये

समय बदल जायेगा लेकिन, रोज चांदनी रोयेगी ।
नन्ही शबनम की बूंदों से, सबकी आँख भिगोयेगी ।

जब यादों की हरी घास पर, शबनम सी बिखरी होगी 
वहीं कहीं प्रद्युम्न नाम की, बूँद एक ठहरी होगी ।

निर्ममता की गूँज हमेशा चीखेगी चिल्लायेगी ।
कोमलता को कुचल स्वयं को, वह महान ही गायेगी ।

किन्तु सत्य है काँटे फूलों, के बस रक्षक होते हैं ।
वे पागल होंगे, मासूमों, के जो भक्षक होते हैं ।।

राहुल द्विवेदी ‘स्मित’
लखनऊ
8299494619

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