तुम मेरी हो (कविता)

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आह!

कैसे सोच लिया तुमने !!

यूँ ही चली जाओगी ,बिना कुछ कहे!!

जाना ही था ,तो क्यों आई थी ?

मेरे जीवन में!!

मुझ निष्प्राण का आधार बनकर!!

क्यों निर्जीव से सजीव किया मुझे!!

आह!!क्यों??

आज भी मैं वही हूँ

वही हूँ पहले सा तुम्हारा गरुर ओ सरुर

तुम्हारे जीवन का संबल!!

प्रेम कभी नहीं मरता ,सुनो !!

आज भी जीवित हूँ मैं ,

ज़रा, मेरी ओर देखो

खड़ा हूँ मैं,

यौवनावस्था के ढलते सूर्य की दहलीज पर!!

अपनी आकांक्षाओं की बलि मत देना

स्वतंत्र हो तुम, प्रिय !!

बस एक बार ,हाँ एक बार

सच्चे दिल से कह दो ,तुम मेरी हो!!

सूर्य डूबने लगा है

देह शिथिल हो रही है

कह दो, बस एक बार

कि यह तुम्हारा अलविदा कहना

वापिस लौटना है !!

– डॉ०पूर्णिमा राय,अमृतसर।
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