अभ्यास एवं प्रयास by Dr.Purnima Rai

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अभ्यास एवं प्रयास

हिन्दी साहित्य के भक्तिकाल के संत एवं समाजसुधारक कवि कबीरदास जी ने अपने दोहों में लिखा है…
करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान
रसरी आवत जात ते सिल पर पड़त निशान।।

निरंतर अभ्यास से मूर्ख व्यक्ति भी बुद्धिमान हो सकता है ।जैसे कुएँ से पानी निकालने वाली रस्सी की रगड़ से पत्थर पर भी निशान पड़ जाते हैं ।अंग्रेजी में भी कहते हैं..”Practice makes a man Perfect”.बार बार किसी कार्य को करने से कार्य करने की कुशलता पर प्रभाव पड़ता है।
अगर कक्षा में कोई छात्र मंद बुद्धि यां वह कक्षा में ध्यान से नहीं पढ़ता तब शिक्षक को काफी कठिनाई आती है।ऐसी स्थिति में इन छात्रों से मित्रतापूर्ण व्यवहार रखकर ,उनकी पढ़ाई हेतु हर संभव सहायता करके हम ऐच्छिक परिणाम प्राप्त कर सकते हैं। लिखना सिखाना ,लिखावट सुधारना सबसे जोखिमपूर्ण कार्य है परंतु असंभव कुछ नहीं होता अगर हम यह बात याद रखें तो अपनी मंजिल पा सकते हैं।आज से पाँच साल पहले मेरी छठी कक्षा में एक लड़की पढ़ने हेतु आई।वह समझती सब थी ।हरेक बात को ध्यान से सुनती और हँसती रहती। शिक्षिका होने के नाते सब की कापियाँ जाँचना मेरा कर्तव्य था।जब उस लड़की की कापी जाँची तो सिवाय नाम के कुछ न लिखा।चाहती तो मैं उसे डाँटती फटकारती यां दो चपत लगा देती पर उसकी भोली सूरत से मुझे भीतरी लगाव हो गया था।बड़े प्यार से उसे समझाया कि अमुक पंक्तियाँ लिखकर दिखाओ। जब वह अगले दिन आई ,और कापी जाँची तो कोई भी पंक्ति में कोई शब्द हिन्दी भाषा जैसा न लगा और न ही वह मातृभाषा पंजाबी का शब्द लगा।खैर ,जब मन में ठान लें कि लिखना सिखाना है,सुधार करना है तो हम लक्ष्य पर पहुँच जाते हैं।उस लड़की की सबसे अच्छी बात यह लगी कि जब “मेरा प्रिय अध्यापक” निबंध कक्षा में करवाना था तो सबसे पहले वह खड़ी हो गई ।और उसने पंजाबी हिन्दी मिश्रित भाषा में “मेरा प्रिय अध्यापक” पर अपनी बेबाक अभिव्यक्ति रखी। वह मेरे दिये कार्य को जब कहा जाता ,तब करके दिखाने लगी। मैने कभी सिर्फ बार बार वर्णमाला लिखने को नहीं दी थी बल्कि बाकी बच्चों को जो कार्य दिया जाता था,उसी अनुसार उस कार्य को जाँचते हुये पहले दो अक्षर,फिर पाँच,फिर सात,फिर मात्रायें …..सही करते करते एक साल के भीतर उस लड़की की लिखाई पढ़ने योग्य हो गई।आवश्यकता थी शिक्षक द्वारा तनिक प्रयास और अभ्यास की !अगर उस वक्त मैं भी उस छात्रा को अनदेखा कर देती और कुछ विशेष प्रयास न करती तो शायद वह हिन्दी भाषा सीख न पाती। आज भी मेरे पास छठी में एक ऐसा छात्र जो पूर्णतया मंदबुद्धि है ,प्रयास कर रही हूँ कि उसे भी हिन्दी लिखना सिखा पाऊँगी यां नहीं ,यह चुनौती मेरे सामने है ।

निरंतर अभ्यास से साहित्य सीखने का कार्य दुष्कर नहीं लगता।त्रुटियों के बिना मानव की कल्पना संभव नहीं है।बस उन खामियों को स्वीकारने की भावना को अपने भीतर स्थान देना आरंभ कर दें,दूसरों को सही दिशा में प्रोत्साहित करना सीख जायें। अपने आपसे अधिक सामान्य स्तर पर हमारा मूल्यांकन हर कोई नहीं कर सकता।हाँ साहित्यिक स्तर पर दूसरों की उचित राय हमें कई बार बहुत खलती है ,उस समय लगता है कि अमुक व्यक्ति होता कौन है,मुझे समझाने वाला आदि आदि…पर कुछ समय बाद हमें ज्ञात होता है कि अमुक व्यक्ति की दी सीख हमारे जीवन की दिशा बदल देती है,बस यही स्वीकार्य की स्थिति चाहे आप आम इंसान हैं ,चाहे साहित्यकार,चाहे नव रचनाकार ..अपना लेंगे तो जीत का झण्डा विश्व पटल पर लहरा पायेंगे।
“स्पर्धा अवश्य करें पर ईर्ष्या नहीं ” पर आज जलन ,ईर्ष्या की भावना इतना घर कर गई है कि बुद्धिजीवी वर्ग भी चापलूसी के बल.पर आगे बढ़ना चाहता है।चलो खैर ,जो जैसा बीजेगा ,वैसा ही पायेगा। हम इतना क्यों सोचे?? खुशामद से प्राप्त सफलता का कोई सिर पैर नहीं होता, श्रम और लगन से ही सुसाहित्यकार बनने के स्वप्न पूर्ण होते है। स्पर्धा करें अपने आप से !अपने आप को बेहतर से बेहतरीन बनाने की !
राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त जी ने कितना सुंदर लिखा है…यह पंक्तियाँ सदैव अपनी सी लगती हैं..

हम क्या थे,क्या हैं और क्या हो गये हैं
आओ विचारें आज मिलकर समस्याएं सभी!!

डॉ.पूर्णिमा राय,अमृतसर।

drpurnima01.dpr@gmail.com

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