नीरजा मेहता: अद्भुत ड्रिल-मेरे शिक्षक मेरा आदर्श (5सितंबर2017 विशेषांक)

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नीरजा मेहता: अद्भुत ड्रिल

देहली के एक पब्लिक स्कूल में लगभग तीस वर्ष मैंने अध्यापिका के पद पर कार्य किया और इस बीच कई खट्टी मीठी यादें संजोयीं। इस लंबे अंतराल में विद्यार्थियों से लेकर शिक्षकों तक एक ऐसा अटूट संबंध बना जो सेवानिवृत्ति के बाद भी कायम है। आज भी विद्यार्थी फ़ोन पर अपनी समस्याएं पूछते हैं। शिक्षण के दौरान हुए अनेकों अनुभवों में से एक अनुभव आप सबसे साझा कर रही हूँ।

एक बार वार्षिक खेलकूद दिवस पर प्रधानाचार्या ने विद्यालय के चारों सदनों की प्रभारियों को बुलाकर आदेश दिया, “हर सदन से एक ड्रिल होनी चाहिए जो अध्यापिकाएं स्वयं करायेंगी” और खेलकूद के अध्यापकों को आदेश दे दिया कि कोई उनकी सहायता नहीं करेगा और न ही राय देगा क्योंकि ये चारों सदनों के बीच एक मुकाबला होगा। मैं भी सुभाष चंद्र बोस सदन की प्रभारी थी। हम अध्यापिकाओं ने हमेशा अपने विषय को ही पढ़ाया था और उसी पर केंद्रित रहे, खेलकूद आदि का ज्ञान भी नहीं था। उसपर ड्रिल कराने का आदेश मिल गया।

हमारे सदन की सभी अध्यापिकाओं को जब मैंने बताया और उनसे राय मांगी तो सब एक-दूसरे को देखने लगीं। किसी को कुछ समझ नहीं आया। साधारण ड्रिल जो हमने अपने स्कूली जीवन में की थीं वही आती थीं और प्रधानाध्यापिका कुछ नया देखना चाहती थीं। इसी तरह दो दिन बीत गए पर कुछ समझ नहीं आया।

तीसरे दिन रात को घर में खाना लगाते समय स्टील की प्लेटों को लेकर अचानक मन में विचार आया कि क्यों न ऐसी प्लेटों को लेकर आवाज़ के साथ कोई ड्रिल कराई जाए। ऐसा विचार आते ही रात को ही घर में बेटी के साथ मिलकर अभ्यास किया। बस फिर क्या था खुशी से झूम उठी मैं।

दूसरे दिन विद्यालय पहुँचते ही अपने सदन की अध्यापिकाओं से विचार विमर्श किया, सबको विचार पसंद आया और पहले हम अध्यापिकाओं ने drum beat पर प्लेटें बजाकर देखीं। बहुत ही अद्भुत और नया प्रयोग लगा। उसके बाद सभी बच्चों से मध्यम आकार की दो-दो प्लेटें मंगवाईं गईं और अभ्यास प्रारम्भ कर दिया। तरह-तरह से कभी गोल घूमकर, कभी बैठकर, कभी चलकर आदि अनेकों तरीकों से अभ्यास कराया गया। इसको पूरा करने में सदन की सभी अध्यापिकाओं ने अपना पूर्ण सहयोग दिया। एक अद्भुत और बेहतरीन ड्रिल तैयार हुई।

कहना अतिशयोक्ति न होगी कि न सिर्फ हमारे सदन ने अपितु अन्य सदनों की अध्यापिकाओं ने भी बेहतरीन ड्रिल तैयार करवाईं जिसको देखकर न सिर्फ प्रधानाध्यापिका अपितु मुख्य अतिथि भी प्रशंसा किये बिना न रहे।

खेलकूद वार्षिकोत्सव के बाद जब हमने प्रधानाध्यापिका से पूछा कि कौनसा सदन प्रथम आया तो उन्होंने कहा, “ये मुकाबला नहीं था, मैं अपनी अध्यापिकाओं से उनका हुनर बाहर निकलवाना चाहती थी क्योंकि मैं जानती हूँ कि आप सब सर्वश्रेष्ठ हैं, सिर्फ पढ़ाना ही नहीं अपितु हर क्षेत्र में आप सब पारंगत हैं और आज ये साबित भी हो गया। आप सब विजयी हुई हैं।” उस दिन हमको भी एक नई पहचान मिली और स्वयं को शिक्षक होने पर गर्व हुआ।——

अज्ञानता को दूर हटाकर,
ज्ञान की ज्योति की आलोकित
मूल मंत्र वाणी बन जिसने,
अपने शिष्य को किया है सुरभित,
अखिल विश्व में जिसकी महिमा
मोक्ष मार्ग से व्याप्त हुई,
ध्यान योग्य वह मूरत अनुपम,
शिक्षक नाम से है सुशोभित।”

नीरजा मेहता

नीरजा मेहता,सेवानिवृत्त शिक्षिका

निवास—- गाज़ियाबाद (यू. पी.)
मो–9654258770
ई-मेल-mehta.neerja24@gmail.com

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