ज्योति श्रीवास्तव : आधुनिक शिक्षक-मेरे शिक्षक मेरा आदर्श (5सितंबर2017 विशेषांक)

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ज्योति श्रीवास्तव : आधुनिक शिक्षक

मेरे शिक्षक ने मुझे इस योग्य बनाया कि मैं उन पर कुछ लिख सकूँ। जिस प्रकार रीढ़ की हड्डी के बिना शरीर मात्र माँस का गोला रह जाता है ठीक उसी प्रकार ‘शिक्षक बिना जीवन ‘ पशुतुल्य होता है । जीवन मे गति एवं दिशा शिक्षक ही देता है ।
आधुनिक दौर में शिक्षक पर कुछ लिख पाना बहुत ही कठिन हो गया है ,क्योंकि प्राचीन समय मे एक गुरु होते थे जो आजीवन आदर्श के रूप में शिष्यों के पथ प्रदर्शक होते थे । एक उत्कृष्ट चरित्र स्थापित कर सभी के स्मृति पटल पर एक आदर्श छवि के रूप में होते थे । शिक्षक और, गुरु में बहुत ही सूक्ष्म अंतर यह है कि गुरु वह होता है जो शिष्य को लक्ष्य /उद्देश्य प्राप्ति तक ले जाता है और शिक्षक कक्षा और विषय तक सीमित रह जाता है ।
➡ बदलते परिवेश में कक्षा ओर कालखण्डों के अंतर्गत एक छात्र को कई शिक्षकों से शिक्षा ग्रहण करनी पड़ती है कुछ शिक्षक तो समयावधि तक ही सीमित रहते हैं ऐसे माहौल में बच्चों के लिए ‘आदर्श ‘ बनना कठिन तो है परंतु असंभव नही । इस परिस्थिति के बाद आज भी शिक्षक समाज के लिए आधार स्तंभ है जो केवल किताबी ज्ञान तक ही सीमित नही वरन हमारे नैतिक गुणों का भी विकास करते है क्योंकि आज समयाभाव के कारण माता-पिता या परिवार को संस्कार नही दे पाते । अतः नैतिक गुणों का दायित्व भी शिक्षक के कंधों पर है इसी कारण आजकल गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा पर बल दिया जाता है । शिक्षक सदैव अपने छात्रों को खुद से भी सफल बनाना चाहता है ।
एक अबोध बालक के लिए शिक्षक ईश्वर तुल्य होता है वह मानता है कि शिक्षक सदा सत्य कहेंगे और शिक्षक के वाक्य ब्रम्हवाक्य होते हैं ।अतः शिक्षक को अपने विद्द्यार्थियों और समाज के समक्ष एक अनुकरणीय आदर्श स्थापित करना चाहिए और जिन शब्दों से शिक्षक को नवाजा जाता है राष्ट्र निर्माता ,सामाजिक आधार स्तंभ ,ईश्वर की गरिमा को बनाये रखें। क्योंकि व्यक्ति अपना मूल्य स्वयं निर्धारित करता है ।
जिन शिक्षक ने हमारे नैतिक गुणों का विकास करते हुए हमारे विचारों को पुष्ट किया।उनका मैं हृदय से सम्मान करते हुए कह सकती हूँ कि ‘ मेरे शिक्षक मेरा आदर्श ‘ है।
श्रीमती ज्योति श्रीवास्तव
सहायक अध्यापिका (खिरैंटी)साईंखेड़ा ज़िला नरसिंहपुर

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