मधु छाबड़ा ‘महक’ :अनपढ़ता -मेरे शिक्षक मेरा आदर्श (5सितंबर2017 विशेषांक)

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मधु छाबड़ा ‘महक’ :अनपढ़ता (कहानी)

“माँ माँ ! कुल्फीवाला आ गया । दो रुपये दो न माँ ।” सारिका भागती हुई माँ के पास कुल्फी खरीदने के लिए दो रुपये माँगने आई । उसी समय मोहल्ले की सभी महिलायें शाम ढलने पर गलियारे में खड़ी बतिया रही थी , कुल्फीवाले को देखते ही सभी अपने अपने बच्चों को लेकर अपने अपने घर में घुस गईं ।
” कुल्फीवाला ! कुल्फीवाला ! ठंडी ठंडी मीठी मीठी मलाईदार कुल्फी लें लो ।” लगभग 10 मिनट तक वह आवाजें लगाता रहा पर कोई बच्चा बाहर कुल्फी लेने नहीं आया ।” न जाने आज क्या हो गया सभी को ?” बेचारा कुल्फीवाला निराश होकर वहाँ से चला गया ।उसके जाते ही गलियारे का माहौल पहले जैसा हो गया ।सभी महिलाएँ पहले जैसे अपनी जगह पर इकट्ठा हो बतियाने लगीं और बच्चे भी वहीँ आकर खेलने लगे । जबकि कुल्फीवाले के आते ही सब अपने अपने घर चले गए थे और वहाँ शांति छा गई थी ।
सभी बच्चे आपस में एक दूसरे से रूआँसे स्वर में कह रहे थे कि आज उनकी माँ ने उन्हें कुल्फी के लिए दो रुपये नहीं दिए न जाने क्या हुआ ।वहीँ दूसरी और सभी औरतें आपस में कुल्फीवाले की बुराई कर रही थीं । ” देखा नहीं तुमने आज कितनी देर तक खड़ा रहा वो ।” सारिका की माँ ने कहा ।दीक्षा की माँ बोली ,” अरे तुमने देखा नहीं वो लड़कियों से कुछ ज्यादा ही नरमी से बात करता है ,न जाने क्या है उसके मन में ।” इसी तरह सभी महिलाएँ आपस में बात कर उस कुल्फीवाले पर अपनी शंकाएं जता रहीं थीं । पास ही चारपाई पर बैठी बूढ़ी अम्मा जो मोहल्ले की सबसे बुजुर्ग , तजुर्बेदार व समझदार महिला थी ,ये सब देख रही थी । उसने सभी औरतों को पास बुलाया और कुल्फीवाले के बारे में बताना शुरू किया ।
कुल्फीवाला बहुत पैसे वाला है और एक बड़ी दुकान का मालिक है । कई साल पहले इसने अपनी इकलौती बेटी का ब्याह किया था । नहीं जानता था कि वह अपनी बेटी को दहेज के लालचियों के हाथों में सौंप रहा है । तब वह गरीब था , दहेज देने में असमर्थ था । इस कारण उसकी बेटी को ससुराल वालों की प्रताड़नाएं सहनी पड़ी ।ज्यादा पढी लिखी न होने के कारण अपने लिए लड़ भी न पाई और सदमे में आ गई ।गुमसुम रहने लगी । कुल्फीवाला अपनी बेटी को अपने घर वापिस ले आया । पर ये समाज….हमारा शिक्षित पर पिछड़ी सोच वाला समाज किसी भी शादीशुदा बेटी को मायके में देख तानाकशी से बाज नहीं आता । बेचारी बिन माँ की बेटी ने बीमारी की हालत में दम तोड़ दिया । कुल्फीवाले की बेटी दहेजलोभियों की बलि चढ़ गई क्योंकि वह शिक्षित नहीं थी , स्वावलंबी व आत्मनिर्भर नहीं थी इसीलिये सहन न कर सकी और अपने पिता को संसार में रोता हुआ अकेला छोड़ गई ।
अपना ग़म भुलाने के लिए कुल्फीवाले ने खूब पैसा कमाने की सोची और मेहनत से कमाया भी साथ ही हर गरीब लड़की को शिक्षित, आत्मनिर्भर और स्वावलंबी बनाने की मुहिम छेड़ दी ।पर अपनी बेटी को भूल नहीं पा रहा था । तब कुल्फीवाला बन कर यहाँ आने लगा….बच्चों से प्यार जताकर और सस्ती सस्ती कुल्फी देकर उनके चेहरे पर मुस्कान देखकर अपने ग़म को भुलाने लगा । कुल्फीवाले के बारे में ये सब जानकर सभी महिलाएँ हैरान हुई साथ ही एक सबक हासिल किया… चाहे कुछ हो जाये अपनी बेटी को शिक्षित व आत्मनिर्भर अवश्य बनायेंगी । कोई कसर नहीं छोडेंगी ।

* बेटियों का शिक्षित व आत्मनिर्भर होना उतना ही आवश्यक है जितना बेटों का । तभी एक सभ्य व शिक्षित समाज की कल्पना की जा सकती है और एक पिछडे हुए अशिक्षित समाज से छुटकारा पाया जा सकता है ।

मधु छाबडा ‘महक
पता….एफ़ /बी -28, टैगोर गार्डन , नई दिल्ली 110027
ईमेल-Chhabramadhu2508@gmail.com

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