प्रियंका गुप्ता: एक सपने सी खूबसूरत मेरी टीचर-मेरे शिक्षक मेरा आदर्श (5सितंबर2017 विशेषांक)

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प्रियंका गुप्ता: एक सपने सी खूबसूरत मेरी टीचर

कहते हैं सीखने की कोई उम्र नहीं होती…| मेरे हिसाब से सीखने की कोई सीमा भी नहीं होती | हम हर पल, हर घड़ी किसी न किसी से कुछ न कुछ या तो सीखते हैं या सीख सकते हैं | वैसे तो आम तौर पर हमारे सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण शिक्षक हमारे माता-पिता होते हैं (उनमे से भी सबसे पहली- माँ ) , पर हमारे जीवन को एक सही आकार और दिशा देने में हमारे विभिन्न शिक्षकों का बहुत बड़ा योगदान होता है

मेरी ज़िंदगी में मेरी माँ की तो बहुत अहमियत रही ही है, पर आज बात अपनी उन शिक्षिकाओं की, जिनके कुछ गुणों…कुछ विशेषताओं ने मुझपर बेहद गहरा असर डाला…| उनमे सबसे पहले याद आती हैं मेरी कक्षा पाँच की क्लास टीचर- सिस्टर फ्लेक्सिना…| मैं क्रिश्चियन मिशनरी स्कूल में पढ़ी, बड़ी हुई…| सिस्टर्स के रूप में अपने आसपास रहने वाली ननों के कोमल और मृदुभाषी स्वभाव का मुझ पर बहुत तगड़ा असर पड़ा करता था | हमारे स्कूल में ज़्यादातर सिस्टर्स तो ऑफिस का काम देखती थी और कुछेक अलग-अलग विषयों को पढ़ाती भी थी |

सिस्टर फ्लेक्सिना बेहद शांत, कोमल स्वभाव वाली एक समझदार टीचर थी | अंग्रेजी और मोरल साइंस की क्लास उनके जिम्मे थी | पूरे एक साल के उनके साथ में मुझे नहीं याद पड़ता कि उन्होंने कभी किसी बच्चे को भी डांटा हो…| बाकी विषयों की क्लास में शरारत का कोई भी मौक़ा ढूंढ लेने वाले बदमाश बच्चे भी जाने किस मन्त्रमुग्धता में उनकी क्लास में बिलकुल अच्छे बच्चे की तरह बैठा करते थे | मुझे याद है, बाकी कई टीचर्स को जहाँ शान्ति पाने के लिए कई बार मेज पर डस्टर या स्केल पटकना पड़ता था, (मारने की हमारे स्कूल में सख्त मनाही थी ), सिस्टर फ्लेक्सिना हल्का सा शोर होने पर वही काम सिर्फ़ मुँह पर उंगली रख कर एक इशारे से कर लिया करती थी।

सिस्टर फ्लेक्सिना सिर्फ़ किताबी ज्ञान ही बाँटने में यकीन नहीं रखती थी, बल्कि हमारे व्यक्तित्व के विकास पर भी उनका बहुत जोर रहता था | सिखाने के लिए उदाहरण देना उनको सबसे ज़्यादा पसंद था | ऐसा नहीं है कि हम सब बहुत शरीफ़ बच्चे थे, गलतियाँ हम सबसे हो ही जाया करती थी कभी न कभी…| ऐसे में वो पढ़ाते-पढ़ाते किसी उदाहरण या किस्से सुनाने की ओर मुड़ जाती…| पहले तो उस गलती का ज़िक्र बेनामी तौर पर उनके किस्से में आता, फिर उस ग़लती को सुधारा कैसे जा सकता है, इसे वो आगे एक उदाहरण के माध्यम से स्पष्ट कर देती | इस दौरान उनकी नज़र जानबूझ कर गलती किए हुए बच्चे पर ही बार-बार जाकर टिक जाती…| चेहरे पर रहस्यमयी मीठी मुस्कान लिए हुए वो अपनी बात कहती जाती और उनकी उस स्नेहमयी शरारती चमक लिए हुई नज़र की ताब सहन न कर पाने वाला बच्चा खुद-ब-खुद शर्मिन्दा हो जाता |

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सिर्फ़ बदमाशी वाली गलतियाँ ही नहीं बल्कि किसी से बातचीत करते समय हमारी `बॉडी लैंग्वेज’ कैसी होनी चाहिए, इस पर भी उनकी नज़र रहती थी | वो अक्सर खाली समय में किसी बच्चे को अपने पास बुला कर उससे यूँ ही कुछ बातें किया करती…कभी उसकी पसंद-नापसंद को लेकर…कभी उसकी फेवरेट किताब की बात पूछ कर…| यानि अपने आसपास की बिलकुल सामान्य लगने वाली किसी भी बात पर वो हमारी व्यक्तिगत राय सुना करती…| हमे अपना मन खोलने, अपना पक्ष रखने को प्रेरित करती…| इसके लिए वो पहले अपने मन की बात बताती, फिर हमसे हमारी सहमति-असहमति जानती | हम बेझिझक उनसे असहमत हो सकते थे…बिना डरे, क्योंकि उस समय वो हमको एक टीचर नहीं, बल्कि एक दोस्त की तरह पेश आती थी…जिनकी नज़र में हमारी बात की भी कोई अहमियत हुआ करती थी | इस दौरान वो चुपचाप हमारी बातचीत का तरीका, हमारे गुण-दोषों को परख रही हुआ करती…और हम जान भी न पाते | कुछ दिन बीतने पर बेहद सहज तरीके से वो हमारे तौर-तरीकों में पकड़ी गई खामियाँ इस तरह बयान कर जाती, कि अपने पर इतराते हम लोगों को न केवल अच्छे से ये समझ आ जाता कि कमी कहाँ थी, वरन् ये भी कि उनको किस तरह से सुधार कर बेहतर बनाया जा सकता है |

सिर्फ़ पढ़ाई-लिखाई ही नहीं, ज़िंदगी को हलके-फुल्के ढंग से जीने की कला भी वो सिखा जाती थी | पढ़ाते हुए, कुछ समझाते हुए वो हमसे मज़ाक भी कर लेती, किसी को नटखटपने से चिढ़ाना भी उनको खूब आता था | हम सब की ढेरों कमियाँ जानने के बावजूद वो भूल से भी किसी को नीचा दिखाने या अपमानित करने की कोशिश भी नहीं करती थी | किसी को हीन महसूस कराए बगैर उसकी मदद कैसे की जा सकती है, इसके उदाहरण के रूप में उनसे जुड़ा एक किस्सा मुझे याद आ रहा |

हमारी क्लास में एक लड़की पढ़ा करती थी, जो आर्थिक रूप से थोड़े कमज़ोर परिवार से आती थी | सिस्टर फ्लेक्सिना को ये बात पता थी | एक दिन उस लड़की के साथ बैठने वाले एक बच्चे की निगाह उसके पेंसिल बॉक्स पर गई तो उसकी लगभग एक इंच की पेंसिल देख वो अचानक सिस्टर से ये बात बोल उठा…| वे समझ तो गई कि शायद घर की परिस्थिति को समझते हुए वह अपने माँ-बाप से नई पेंसिल की बाबत नहीं बोल पाई होगी…| उन्होंने उसे बड़े प्यार से उस पेंसिल के साथ अपने पास बुलाया, एक पल के लिए अपने हाथ में उस नन्हीं-सी पेंसिल के टुकड़े को लेकर उलटती-पुलटती रही…और फिर एक बाल-सुलभ सी विनती के साथ उससे वो पेंसिल माँग बैठी…| उस लड़की के साथ-साथ पूरा वाकया उत्सुकता से देख रही क्लास भी उनका यह अनुरोध देख कर हतप्रभ थी | उन्होंने जो कारण बताया वो कुछ यूँ था (बोली तो वो अंग्रेजी में थी, क्योंकि अंग्रेजी मीडियम स्कूल था, पर मैं हिन्दी में लिख रही), “बचपन से मुझे छोटी पेंसिल से लिखना बहुत पसंद है…| मुझे लगता था जैसे मेरे पास जादुई उंगली है…और मैं पेंसिल से नहीं बल्कि अपनी उँगलियों से लिख रही…| मुझे ये दे दो प्लीज…मुझे लगेगा मैं फिर से बच्ची बन गई हूँ…| तुम इसके बदले मेरी पेंसिल रख लो…| हम दोनों के ऊपर फिर किसी का कोई उधार नहीं रहेगा…|”

उस उम्र में तो शायद पूरी क्लास नहीं समझ पाई थी…पर आज जानती हूँ, सिस्टर फ्लेक्सिना ने उस पल पेंसिल के बदले पेंसिल का लेन-देन नहीं किया था, बल्कि किसी को खुशी देने के बदले एक संतुष्टि-भरी खुशी पाई थी…|

उस एक साल के पूरा होते-होते उनका ट्रांसफर कर दिया गया था | फाइनल एग्जाम के आख़िरी दिन हम सबसे विदा

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लेती सिस्टर फ्लेक्सिना की ज़ुबान पर हम सबके उज्जवल भविष्य के लिए शुभकामनाएँ थी, होंठों पर वही चिर-परिचित मासूम सी मुस्कान थी…तो हम सबकी भीगी आँखों के साथ बस एक विनती…प्लीज डोंट गो सिस्टर…वी डोंट वांट यू तो लीव…|

हमारी इस विनती से शायद उनका मन भी ज़रूर भारी रहा होगा, पर हम में से हरेक के पास आकर हाथ मिला कर विदा लेती सिस्टर फ्लेक्सिना उस दिन भी पॉजिटिव थी…’देखना, एक दिन कहीं-न-कहीं हम ज़रूर मिलेंगे…| बस इस बात का विश्वास रखना होगा…|’

शायद इसी विश्वास का परिणाम था कि बरसों बाद…जब मेरा खुद का बेटा पाँचवी क्लास में था, अपने स्कूल के गोल्डन जुबली फंक्शन में सिस्टर फ्लेक्सिना से एक बार फिर मुलाक़ात हुई…| वही सौम्य चेहरा…वही निश्छल, आँखों तक चमक बिखेरती मासूम मुस्कान…वही गर्मजोशी…| उस बार फिर उनसे विदा लेते हुए, फिर कभी-कहीं उनसे मिलने का विश्वास दिल में सँजोए जब मैंने उनका ऑटोग्राफ माँगा था…तो अपनी सुन्दर सी हस्तलिपि में उन्होंने लिखा था…
‘सपने देखती रहना, क्योंकि एक न एक दिन वे ज़रूर पूरे होंगे…|’

प्रियंका गुप्ता
संपर्क: एम.आई.जी-292, कैलाश विहार,
आवास विकास योजना संख्या-एक,
कल्याणपुर, कानपुर-208017 (उ.प्र)
priyanka.gupta.knpr@gmail.com
ब्लॉग : “http://www.priyankakedastavez.co.in” www.priyankakedastavez.co.in
मो—- 09919025046

 

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