डॉ चन्द्रा सायता:लड्डू का चोर कौन?-मेरे शिक्षक मेरा आदर्श (5सितंबर2017 विशेषांक)

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डॉ चन्द्रा सायता:लड्डू का चोर कौन?

गुरूकुल में संभ्रांत परिवारों के बच्चे जीवन जीने की व्यावहारिक शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। सत्र समाप्ति पर वे सभी कुछ दिनों के लिए अपने- अपने घर गये हुए थे।
नया सत्र आरंभ होने से पहले पांच बालकों का प्रवेश हो चुका था ।आज गुरूदेव ने उन्हें प्रारम्भिक परिचय के लिए बुलाया था। उन्होंने एक गुरुकुलवासी सेवक को बुलाकर कहा –“सुनो रामधन। मैंनें एक डिब्बे में मोतीचूर के पाँच लड्डू रखवाए थे। महाराज से मांगकर ले आओ ।”
कुछ ही देर में रामधन डिब्बे के साथ उपस्थित हो गया और उसने गुरूदेव की आज्ञानुसार डिब्बा खोलकर उन्हें दिखाया। डिब्बे में मात्र चार लडृडू
दिखे ।
गुरूदेव ने तुरन्त निर्णय लिया कि एक लड्डू चुराने वाला बालक इन्हीं पांचों में से हैं । उन्होंने विचारित युक्ति के अनुरूप कार्रवाई आरम्भ करते हुए बारी- बारी नवागंतुक पांचों शिष्यों से एक ही प्रश्न किया—” क्या तुमने लड्डू चुराया?

सभी का उत्तर नकारात्मक था।फिर भी कोई एक तो झूठ बोल रहा था। गुरूदेव ने एक शिष्य को छोड़कर बाकी चारों में एक-एक लड्डू बाँट दिया । उन्होंनें लड्डू न मिल पाने वाले शिष्य के चेहरे के भावों का निरीक्षण किया । वह शांतचित्त होकर सुखासन में बैठा रहा।

गुरूदेव ने चारों शिष्यों से लड्डू पुन: एकत्रित करवा लिए।अब एक अन्य शिष्य को छोड़कर फिर चार शिष्यों में बाँट दिये और लड्डू से वंचित अन्य शिष्य के चेहरे को पढ़ा। उन्होंने यही प्रक्रिया कुल चार बार दुहराई , क्योंंकि वे जानना चाहते थे कि किस शिष्य का चेहरा छिपे चोर का आईना बनता है।

अंत में गुरूदेव ने एक शिष्य को खड़े होने का आदेश देते हुए कहा——
” बेटा सच बोलना बड़ा कठिन काम होता है, परन्तु जो इस कार्य को कर लेता है,उसका सभी लोग सम्मान करते हैं।
शिष्य गुरु के चरणों पर गिर पड़ा और विलाप करने लगा। गुरूदेव ने उसे उठाकर गले से लगा लिया और सस्नेह कहा
— “पुत्र। तुम्हें अपने साहस का पारितोषक अवश्य मिलेगा वो भी अपने चारों साथियों से।,”
गुरूदेव ने शेष चारों शिष्यों को उनके पास उपलब्ध एक – एक लड्डू को चार समान भागों में बाँटने को कहा–” क्या आप चारोंअपने साथी को उसके द्वारा सत्य बोलने पर सम्मानित करना चाहते हो?
” सभी एक-साथ बोल पड़े”जी हां गुरूदेव।” वे अपने गुरू का संकेत समझ चुके थे। उन्होंने अपने- अपने लड्डू के चार हिस्सों में से एक-एक हिस्सा पांचवें साथी को दे दिया
चार हिस्से अर्थात पूरा एक लड्डू प्राप्त करने पर वह प्रश्न सूचक दृष्टि से गुरूदेव की ओर देखने लगा ।वे मुस्कुराए और अत्यंत स्नेह से बोले” देखो तुम्हारे चारों साथियों ने अपने हिस्से के एक लड्डू का चौथाई भाग तुम्हें दे दिया– इसके लिए बड़ा दिल चाहिए।”

उन्होंने पुनः उस शिष्य को इस बात का अनुभव कराया कि यद्यपि उसने एक लड्डू पहले ही चुराकर खा लिया है, फिर भी उसे सबसे बड़ा हिस्सा मिला है।

शिष्य ने गुरूदेव के चरणस्पर्श करते हुए शपथ ली कि वह भविष्य में कभी असत्य नहीं बोलेगा उसने अश्रुपूरित नेत्रों से गुरूदेव की ओर देखते हुए कहा” गुरुजी आपके द्वारा दी हुई शिक्षा मैं कभी नहीं भूलूँगा।”

डॉ चन्द्रा सायता
१९श्रीनगर कालोनी (मेंन)
इंदौर ४५२०१८
ई-मेल-chandrasayata@yahoo.in

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