द्वन्द्ध (रूबी प्रसाद)

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द्वन्द्ध (लघुकथा)

जाने कब से द्वंद चल रहा था उसके अन्दर ।
चल तैयार हो जा मुँह क्यों बना हैं ? चल हँस ।
हाँ ठीक हैं ,ठीक हैं , जानती हूँ बिमार हैं , दवा पड़ी हैं , खा ले शाम होने को आई कस्टमर आता होगा ।

बिलख पड़ी शोभा ,पर फिर बिन दवा खाये ही चेहरे को सजाने लगी । आइने में यू लगा अचानक ही उसकी परछाई भी संग उसके रो दी । कोई तो ना था जिससे बातें कर मन हलका करती । ये झिड़कियाँ तो रोज की कहानी थी बस उसकी ही नहीं कोठे की हर लड़की की । आदत सी हो गयी थी कोई जिये मरे किसी को परवाह नहीं ।

आइने के सामने बैठी खुद से ही बातें करने लगी मौन । अपने चेहरे से मुखौटा उतार खूब चीखना चाह रही थी ।

कौन हूँ मैं ? क्या हूँ मैं ? क्या सच मैं एक इंसान हूँ या बस एक देहमात्र जिसे जब बिना मेरी मर्जी के ……..?
रोज ये द्वंद चलता अन्दर उसके ।
क्या वजूद हैं मेरा कुछ नहीं ।
मेरी बस एक ही पहचान हैं ” वेश्या ” जिसे जब चाहे जो चाहे पैसे फेंक रौंद कर निकल जाता हैं ।
फफक पड़ी शोभा फिर । तभी मानो अंदर से आवाज आयी शायद आत्मा की आवाज । पगली तू वेश्या नहीं देवी का दूसरा रुप हैं , तू हैं तो ये दरिंदे यहाँ आते हैं और कोई लड़की इनकी हवस का शिकार होने से बच जाती हैं ।
तू मौन हैं तो सभी सफेदपोशों के घिनौने चेहरे छिपे हैं ।
तू हैं तो इस श्रृष्टि से पाप का बोझ थोड़ा कम हैं । तू तो पवित्रता की मूर्ति हैं पूजन योग्य हैं ।

अरे अपवित्र तो वो हैं जो तुझे शरीर मात्र समझते हैं । चल उठ कि आज तुझे फिर से बिक कर एक लड़की की अस्मत लुटने से बचानी हैं ।

आँसू सूख गये शोभा के आज खुद से ही आत्मसात हो कर । उठ खड़ी हुई कि शाम होने को आ गयी थी कोठे की मालकिन की गालियाँ और तबले की आवाज कमरे तक आ रही थी । आज मुद्दतों बाद मुस्कुरायी आइने की तरफ देख मानो कह रही हो हाँ मैं अपवित्र नहीं ना ही गंदगी हूँ , मैं तो वेश्या हूँ जो समाज की गंदगी अपने सर लेती हूँ । मैं तो रक्षक हूँ ।।

रूबी प्रसाद
सिलीगुड़ी

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1 COMMENT

  1. रूबी बहन,
    सच मे जो लिखा है वो आईना है उस समाज का जिसको हम सभ्य मानते हैं ।पर सच दिखाई नहीं देता या फिर हम देखना नहीं चाहते, हां देखना नहीं चाहते क्योंकि अगर उस सच मे खुद की सूरत दिख गयी तो, डरते हैं । कभी किसी से कहने में असहज महसूस कर बैठता हूँ ,पर समाज के इस वर्ग की बहुत इज्जत करता हूँ मैं जिसको लोग वैश्या कहते हैं । सिर्फ यही वजह है जिसको आपने शब्दों में पिरोया है ।
    आपको मेरा कोटि कोटि नमन ।

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