टूटता ही जा रहा इन्सान(सुभाषित श्रीवास्तव अकिंचन)

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1) ग़ज़ल

ढोंगी बाबाओं का देश में इस कदर फैला जाल,
आशाराम,राम-रहीम न जाने कितनेगुरुघंटाल।

लहरा रहें हैं हर तरफ व्यभिचार के झंडे
हिंसा,दंगे करने वाले,ये सब हैं बिकाऊ माल।
एक समय कीमत में भर जाता था थैला,
बढ़ती महँगाई में अब थैला बना रुमाल।
मिल जाएंगे हरेक मोड़ पर अब भी अत्याचारी,
फैला हुआ दिग-दिगन्त तक घोटालों काजाल।
हो गयी दुनिया झूठ-फरेब की आजअकिन्चन,
सच और ईमान की भी अब बदल गयी हैचाल।
सुभाषित श्रीवास्तव अकिन्चन। हल्द्वानी।
2) ग़ज़ल—-
टूटता ही जा रहा इन्सान है,
कर रहा वह अब विषपान है।
मेरी तकदीर से भी आजकल,
शायद रूठा हुआ भगवान है।
मिल रही रहबरों को गालियाँ,
रहजनों का हो रहा सम्मान है।
गुम हो गयी शराफत ऐ अकिन्चन,
कोसों दूर मुझसे अब ईमान है।
सुभाषित श्रीवास्तव अकिन्चन,हल्द्वानी।
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