तरंग और जिंदगी

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तरंग और जिंदगी

नदी से उठती ,
तरंग,
सी है,यह जिंदगी की जंग,
हर पड़ाव पे,
होता है ,इसमें,
नवरंग का जुड़ाव।

नदी से उठती,
तरंग सी,
यह जिंदगी भी,
लड़ती है ,जंग,
राह में खड़ी,
चट्टानों से।

नदी से उठती,
तरंग सी,
इस जिंदगी का ,
सफर भी है,
शमशान तक,
जलने तक का अस्तित्व है,
फिर राख में तब्दील।

बादल में तबदील,
तरंग,
हवा में राख बन उड़ती ,
जिंदगी से,
बतियाती  होगी,
हमारी कहानी एक सी है।

वीपी ठाकुर 
कुल्लू,हिमाचल प्रदेश
वर्तमान में बागवानी में सक्रिय 
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