ज़बान का जो खरा नहीं है(धर्मेंद्र अरोड़ा मुसाफिर)

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गज़ल-

ज़बान का जो खरा नहीं है!
यकीन उसपे ज़रा नहीं है!!

लगे असंभव उसे हराना!
वो आंधियों से डरा नहीं है!!

समझ सके ना किसी की’ पीड़ा!
के’ ज़ख्म जिनका हरा नहीं है!!

लहू हमारा लो’ पी रहा वो!
गुनाह से दिल भरा नहीं है!!

रहे मुसाफ़िर सदा शिखर पे!
ज़मीर जिसका मरा नहीं है!!

विशेष–12122 12122

धर्मेन्द्र अरोड़ा “मुसाफ़िर”
(9034376051)

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