पाँच दोहा मुक्तक (रमेश शर्मा)

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 दोहा मुक्तक ( रमेश शर्मा)
1)
खत्म रसोई में हुआ , खाना जितनी बार !
 माँ ने फांका कर लिया, झूठी मार डकार !!    
 किया हमेशा सोचकर,माता ने ये त्याग,          
रमे सभी निज कार्य में , रहे सुखी परिवार !!
2)
रिश्तों मे दिखता नही,.वहाँ जरा भी चाव !
जहाँ दिलों मे प्यार का,जलता नही अलाव !
किया नही इस बात पर,जल्दी अगर विचार,
हो जाता है एक दिन,आपस मे टकराव! !
3)
यूं झाके हैं चाँदनी,….चंदा की ले ओट !
दिल मे जैसे आ गया,उसके कोई खोट!
है ये धोखा आँख का,या समझू कुछ और,
लगती नाजुक फूल सी,कभी लगे अखरोट! !
4)
नाजायज जायज लगे, जायज न्यायविरुद्ध !
जहाँ भावना मर्म की, होती नहीं विशुद्ध !!
करें बुराई का सदा,खुलकर मित्र विरोध ,
पडे जरूरत कीजिए, खातिर उसकी युद्ध!
5)
भारत माँ को हो रहा, ..इसका बड़ा मलाल!
उसके हुए शहीद फिर,सीमा पर कुछ लाल!
दहशत से ससांर को ,कैसे मिले निजात,
दिल मे सबके उठ रहा,कब से यही सवाल!!
रमेश शर्मा,साहित्यकार
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3 COMMENTS

  1. दोहा मुक्तक बहुत ही शानदार हैं।सामाजिक धरातल पर शब्दों एवं भावनाओं की उत्तम अभिव्यक्ति…हार्दिक बधाई आ.रमेश भाई साहिब..

  2. हार्दिक आभार आपका व आरकी पूरी टीम को बहन

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