सफेद सुन्दरी (कहानी) धारावाहिक-4

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सफेद सुन्दरी (कहानी )धारावाहिक–4

राक्षस सूँघते-सूँघते वहाँ पहुँच गया, जहाँ शहज़ादा और उसकी पत्नी थे। शहज़ादा कोई मामूली योद्धा नहीं था।उसने युद्ध की न सिर्फ शिक्षा ली थी बल्कि वो बहुत सारे युद्ध सफलता से लड़ चुका था । निडरता शहज़ादे में कूट कूट कर भरी थी। वो हर युद्ध सिर्फ और सिर्फ जीतने के लिए लड़ता था।हारना शहज़ादे ने नहीं सीखा था और न ही उसने हार का मुँह कभी देखा था। राक्षस ने बहुत से योद्धाओं से युद्ध किए होंगे पर उससे कोई नेक दिल और बिना किसी स्वार्थ के दूसरों के लिए जीने और लड़ने वाला योद्धा शायद ही टकराया होगा।
शहज़ादा पहले ही से ये जानने के लिए बेचैन था कि विरान देश के लोगोंके साथ आखिर हुआ क्या था और अब उसके सवालों के जवाब दहाड़ते हुए उसकी तरफ बढ़ रहे थे ।
शहज़ादा अपनी तलवार हाथ में लिए खड़ा था जब वो राक्षस उसके सामने पहुंचा । राक्षस ने ध्यान से शहज़ादे को देखा। राक्षस को पहली नज़र में लगा कि वो कोई आम इंसान नहीं है ।शहज़ादे ने राक्षस को ललकारा और पूछा कौन हो तुम? राक्षस ने अट्टहास करते हुए कहा कि “लगता है तुम यहाँ नए आए हों, तुमने कुएं के राक्षस का नाम नहीं सुना होगा । मैं वही हूँ । मैं इस देश के सभी लोगों को मार कर खा चुका हूं । तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई यहां ठहरने की । तुम्हें मेरे यहाँ पहुँचने से पहले ही खिसक जाना चाहिए था।”
शहज़ादे को बहुत गुस्सा आया । उसने कुएं के राक्षस ललकारा ।

राक्षस को कोई सच्चा योद्धा मिला नहीं था तभी वो आजतक हर किसी को हराता आ रहा था ।शहज़ादे ने जब राक्षस को ललकारा तो ऐसा लगा मानो आकाश काँप गया हो और धरती हिलने लगी हो। शहज़ादे ने अपनी फौलादी तलवार जो बिजली के समान कड़क रही थी का एक भरपूर वार राक्षस पर किया । पहले वार से ही राक्षस लड़खड़ा गया । राक्षस भी हारने वाला नहीं था उसने भी शहज़ादे से डट कर युद्ध किया।इस द्वंद्व युद्ध से धरती और आकाश थरथराने लगे। हथियारों की आवाज़ों से कान बहरे हो रहे थे।धूल के बादल उड़ रहे थे जिनमें देखना कठिन था कि कौन जीत रहा है और कौन हार रहा है ।
धूल छंटी तो शहज़ादे की पत्नी ने देखा राक्षस जान बचा कर भाग रहा है और जाकर उस कुएं में छिप गया जिसमें वो रहता था । शहज़ादा हर युद्ध नीति जानता था । उसने राक्षस को कुएं से खींच निकाला और तलवार के वार से उसकी दोनों बाहें काट दी। अब राक्षस जान की भीख मांगने लगा। शहज़ादे ने उसे याद दिलाया कि उसने भी इतने ज़्यादा लोगों पर दया नहीं की थी और उन्हें मौत के घाट उतार दिया था।शहज़ादे ने बिना दया दिखाए राक्षस की दोनों टाँगें भी काट दी।
राक्षस ने गिड़गिड़ाते हुए कहा कि ‘हे अजनबी बहादुर इंसान अब मैं लाचार हो गया हूँ , अब मैं किसी का क्या बिगाड़ सकता हूँ इसलिए इतनी दया करो कि मेरी जान बख्श दो।”शहज़ादे ने राक्षस की जान बख्श दी जो कि एक बड़ी गलती साबित होने वाली थी।

शहज़ादे ने राक्षस को उस घर के एक बड़े से कमरे में बंद कर दिया जिसमें शहज़ादा और उसकी पत्नी ठहरे थे । बिना बाहों और टाँगों के राक्षस पर शहज़ादे ने अपनी अथाह ताकत के साथ एक बहुत बड़ी चट्टान उठा कर उसके ऊपर रख दी ताकि वो हिल भी न सके। राक्षस हाए- हाए कर रहा था।शहज़ादे की पत्नी ये सब इत्मीनान से देख रही थी । उसके मन में कुछ और ही चल रहा था ।
सुबह हुई शहज़ादे ने अपनी पत्नी से कहा कि वो पास के देश में जाएगा अगर कोई इंसान मान जाए तो उसे इस देश में रहने के लिए मनाएगा।शहज़ादा शाम तक लौट आने का कहकर चल दिया ।
शहज़ादे की धूर्त पत्नी घर में अकेली थी और उस बड़े कमरे से हाए हाए की आवाज़ें आ रही थी । उसने वही किया जो उसके चालाक स्वभाव से उम्मीद की जा सकती थी । उसने बड़े कमरे का दरवाज़ा खोला । वो जा कर चट्टान के पास खड़ी हो गई। उसने ध्यान से राक्षस को देखा । उसके डरावने चेहरे को देखा। उस काले और ज़ालिम दिल वाली सुंदरी ने बिना किसी हिचक के सोचा कि अगर इस राक्षस जैसा कोई उसके जीवन में होता तो वो इस पूरे संसार पर जीत हासिल कर सकती थी। तब उसके ज़ुल्मों पर इतिहास लिखा जाता और लोग उसे युगों युगों तक याद रखते। एक पूरे देश को खा जाने वाले राक्षस को उस स्याह दिल वाली औरत ने मेहरबान नज़रों से देखा जो राक्षस से छुपा न रहा।
राक्षस ने तुरंत इस मेहरबानी का लाभ उठाते हुए कहा ” हे दयालु देवी मैं पीड़ा से तड़प रहा हूँ । मेहरबानी करके मुझे इस नर्क जैसे दर्द से छुटकारा दिला दो। वो हैरानगी से बोली “भला इसमें मैं तुम्हारी क्या मदद कर सकती हूं । तुम्हारी बाहें और टाँगे तो कट चुकी हैं ।”

continue–

नवीन किरण ,हिंदी अध्यापिका,
करतारपुर जालंधर

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