डॉ. प्रदीप कुमार’दीप’रचित मैं नारी हूँ  (नारी काव्यांजलि) पुस्तक का भावपक्ष एवं कला पक्ष : नीरजा मेहता

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मैं नारी हूँ  (नारी काव्यांजलि) पुस्तक का भावपक्ष एवं कला पक्ष : नीरजा मेहता

डॉ.प्रदीप कुमार ‘दीप’

साहित्यागर प्रकाशक जयपुर से प्रकाशित, *डॉ प्रदीप कुमार ‘दीप’* जी ने अपना काव्य संग्रह *”मैं नारी हूँ”* (नारी काव्यांजलि) को नारी के लिए लिखकर नारी को समर्पित किया है जिसकी भूमिका उनकी पत्नी श्रीमती *विमला महरिया ‘मौज’* ने लिखी है। 128 पृष्ठों की इस पुस्तक में डॉ प्रदीप ने नारी को लेकर 64 कविताएँ लिखी हैं जो अवर्णनीय हैं।

कवि ने अपनी इस पुस्तक को पाँच सर्गों में विभक्त किया है—नारी-वंदन, नारी-स्पंदन, नारी-स्कंदन, नारी-क्रंदन और नारी-दृष्टांत। इन पाँचों सर्गों में कवि ने नारी के हर रूप का इतना सशक्त वर्णन किया है कि एक साधारण नारी असाधारण प्रतीत होती है। उनकी ये पुस्तक नारी सशक्तिकरण की अनुपम कृति है।

पुस्तक का भाव-पक्ष~~
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भावनाओं को चुनकर शब्दों में पिरोना एक उत्कृष्ट कवि की पहचान है और डॉ प्रदीप इसमें सफल रहे हैं। उनकी कविताओं में भावों की प्रधानता है। नारी के हर पहलू जैसे मन की गहराई, वेदना, संघर्ष, रुदन, आक्रोश, हौसलों की उड़ान व नारी जागरण आदि में नारी के बिखरते संवरते रूप को, उसके जीवन से जुड़ी गहन बातों को उन्होंने सच्ची अभिव्यक्ति में ढाला है जो मन को कहीं गहरे छू जाती हैं और दिल पर दस्तक देती सी प्रतीत होती हैं।

*प्रथम सर्ग* में उन्होंने नारी के हर रूप को वंदन किया है। माँ सरस्वती से लेकर माँ, दादी, नानी, पत्नी, सुता, सखी, भगिनी तक जो वंदन की माला पिरोई है उसकी जितनी प्रशंसा करूँ कम है। सुंदर शब्दों में सखी वंदन करते हुए कवि कहते हैं—- *”पल-पल तुझमें नव आकर्षण और नव रश्मि सी संचारी”* —कितनी ख़ूबसूरती से उन्होंने सखी का बखान किया है और सुता वंदन करते हुए कहते हैं कि — *”दादाजी की छड़ी सयानी दादी की दुलार है बेटी”* —
कितनी भाव भीनी रचना है।
उन्होंने नारी को सृष्टि संघायिनी, कर्तव्यपरायिणी, सिद्धि सारायिणी, कीर्ति प्रसारिणी, दिव्य प्रकाशिनी, नारी नारायिणी कहकर वंदन किया है। ये कवि के मन में नारी के प्रति आदर के भाव दर्शाता है।

*द्वितीय सर्ग* नारी-स्पंदन में नारी के करुण रूप से लेकर उसके कर्त्तव्य, स्वभाव, अभिमान, मर्यादा, पूर्णता के साथ उसको नव सृजना के रूप में दर्शाया है। अपने सारे दुःख दर्द भूलकर अपने कर्त्तव्य के लिए स्वयम को समर्पित होती नारी वास्तव में कल्याणी ही है। कवि के मन के भाव इन कविताओं में उभरकर आये हैं। कवि “नारी हूँ और नाज़ भी हूँ” कविता में कहते हैं–
*नारी हूँ मैं नहीं विधाता पर विधान बताने आई मैं, बन जाऊँ मैं भाग्य विधाता नर भाग जगाने आई हूँ*
“मर्यादा हूँ” रचना नारी को उसकी पहचान कराती है।
“बेटी की पुकार” कविता में अजन्मी बेटी की तड़प दिखाई है।
“स्वभाव मेरा” कविता में नारी के इंद्रधनुषी सतरंगी स्वभाव को बहुत ही कलात्मक रूप से दर्शाया है। उन्होंने नारी के स्वभाव के सात रंग— *मर्यादा, समर्पण, संस्कार, त्याग, स्नेहशीलता, ममता, सृजनशीलता* बताए हैं। स्त्री का इतना सार्थक व सटीक वर्णन कवि की चित्रात्मक शैली का कमाल है।

*तृतीय सर्ग* नारी-स्कंदन में नर द्वारा किये अत्याचारों से दुःखी नारी का आक्रोश दर्शाया है। “दम घुट गया, कुकृत्य, वधू का दहन, तीन तलाक़” आदि रचनाएं नारी पर हो रहे अत्याचार की कहानी कह रहे हैं। कवि ने स्वर्ग में बैठी पीड़ित महिला का बहुत सशक्त वर्णन किया है “मैं निर्भया बोल रही हूँ” रचना में कवि के भाव देखिए–
*मैं स्वर्ग से निर्भया बोल रही हूँ, नर के वेश में छुपे हुए भेड़िए को कोस रही हूँ*
नारी की पीड़ा दृष्टिगोचर है, उसके दर्द में निकले शब्द आक्रोश दर्शा रहे हैं।

*चतुर्थ सर्ग* नारी-क्रंदन पर है। करुण रस से रची बसी रचनाओं में नारी की व्यथा वर्णित है।
“नारी-व्यथा” रचना में दुःखी हो स्वयम से सवाल करती नारी, कवि के शब्दों में–
*कैसी निर्बल? कैसी निःशक्त? क्यों अबला मैं बन बैठी? क्यों मेरा अपमान हुआ?*
“बेवा का दर्द” अत्यंत मॉर्मिक रचना है।
“बालिका-बधू” में बालिका का दर्द कितने सरल शब्दों में बताया है और उनकी ये सरलता सीधे मन पर प्रहार करती है—
*छीन खिलौने मुझसे सारे, क्यों चकला-बेलन थमा दिया*
“अश्रु की पीड़ा, विष प्याला” आदि रचनाएं नारी की गहन पीड़ा दर्शा रही हैं।

*पंचम सर्ग* नारी-दृष्टांत में कवि ने नारी को एक प्रेरणा, एक सम्बल बनाकर प्रस्तुत किया है। पुस्तक का सर्वाधिक प्रबल सर्ग है। ये सर्ग नारी सशक्तिकरण का दृष्टांत है। इतिहास पर आधारित “लक्ष्मीबाई, पद्मिनी की मर्यादा, सावित्री” आदि रचनाएं नारी के हौसले को बढ़ाती हुई बेहद सशक्त रचनाएं हैं। स्त्री को शक्तिरूपिणी बताते हुए कवि कहते हैं–
*कभी बनी सावन की रिमझिम, कभी शक्ति का आधार बनी*
“देवी” कविता में कवि ने नारी को ज़माने की रीढ़ व प्रेरणास्रोत कहा है।
“मृगतृष्णा” कविता में स्त्री को चेताते हुए कवि कहते हैं–
*क्यों मृगतृष्णा में तू दौड़े, अभी तू अपना स्व पहचान*
“अवन्तीबाई” कविता में कवि लिखते हैं–
*चूड़ी कंगन को भिजवाकर लोगों की रूह जगाई थी*
ओज से परिपूर्ण रचनाओं में कवि के मन के भाव खूब उभरे हैं।

पाँचों सर्गों में नारी की संपूर्णता की झलक सजीव है। नारी को सृजना बताया है, संसार का सृजन करने वाली। नारी के स्वरूप को दिखलाती, कवि के मनोभावों को दर्शाती सजग रचनाएं हैं। कहीं नारी को देवी बताया है तो कहीं करुणा की प्रतिमूर्ति, कहीं ममता का स्वरूप दिखाया है तो कहीं तेजस्विनी रूप झलकाया है, कहीं समर्पण की भावना दिखाई है तो कहीं अपने हक़ के लिए जूझती नारी दिखाई है। इसके अतिरिक्त “कुमाता” और “थू है तुझ पर” कविताओं में स्त्री की विकृत मानसिकता भी दिखाई है, “देवी” कविता में नाम से देवी की विलुप्तता पर अच्छा व्यंग्य भी किया है।
हर रूप में सजी नारी कवि की लेखनी के जादू से और भी ऊँची उठ जाती है।

रचनाओं का कला-पक्ष~~
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डॉ प्रदीप जी की कविताओं में भाषा की सरलता है, विलक्षणता है, सौंदर्य है और माधुर्य भी है। सुंदर बिम्बों से, शब्दों के संयोजन से जो रस समाया है वो अकथनीय है। मुक्त छंद के साथ तुकांत व गेय रचनाओं ने सरस और मधुर शैली में बरबस पाठक को अपनी ओर खींचा है। कलात्मकता व चित्रात्मकता ने भावों को उभारा है।
*व्यष्टि-समष्टि, ज्योति-स्वाति, कर्म-मर्म* आदि तुकांत शब्दों का खूब प्रयोग किया है।
भाषा का सौंदर्य देखिए–
*तड़ित दामिनी सी कड़की थी*
अनुप्रास अलंकार का प्रयोग कई पंक्तियों में देखने को मिलता है, जैसे– *मैं सुरों की संगी साज़ भी हूँ*
प्रदीप जी की रचनाओं में शब्दों का सुंदर संयोजन मनभावन है, जैसे–
*मैं सारभूत अभिव्यक्ति हूँ*
शब्द युग्मों का प्रयोग भी उन्होंने खूब किया है जिससे कविता का सौंदर्य बढ़ गया है, जैसे– *समर-चण्डी, अरि-शीश, दीप-शिखा, लव-जेहाद* आदि।
इस तरह कहीं ओज– *झलकारी की झलक देखकर, वो बुन्देले भी हाँफ गये*
कहीं माधुर्य– *गीत भी हूँ, संगीत भी हूँ, शीतल मलयी बहार भी हूँ*
कहीं करुण– *मैं बेटी! अजन्मी। अपना अस्तित्व बचा रही!*
कहीं वात्सल्य रस– *तेरा निश्छल प्रेम ही मैया, अमृत बनकर है बहता* के समावेश ने रचनाओं को निखारा है।
उनकी कविताओं में नारी का चित्रण काल्पनिक नहीं अपितु सजीव है। सत्य के दर्शन कराती उनकी रचनाएं हर नारी के जीवन की कहानी है। बेहद खूबसूरती से नारी का सम्पूर्ण संसार दिखाया है। कहना अतिश्योक्ति न होगी कि हर रचना अपने आप में बेमिसाल है। डॉ प्रदीप के काव्य कौशल को मैं नमन करती हूँ। नारी शायद स्वयं को इतना नहीं जानती होगी पर उनकी रचनाएं पढ़कर अंतस में ऐसा आभास होता है कि ये शायद मेरे लिए या हर स्त्री के लिए लिखी गयी है।

मैं डॉ प्रदीप जी को हिंदी साहित्य को उनकी अनमोल निधि *मैं नारी हूँ* (नारी- काव्यांजलि) के लिए हार्दिक बधाई व अनंत शुभकामनाएं देती हूँ। साहित्य जगत में उनका नाम अमर हो यही शुभकामना है।

नीरजा मेहता

नीरजा मेहता
सेवानिवृत्त शिक्षिका एवं कवयित्री

सम्पर्क सूत्र —
पता—
बी 201 सिक्का क्लासिक होम्स, जी.एच.– 249, कौशाम्बी गाज़ियाबाद (यू. पी.)पिन-201010
मोबाइल–9654258770
ई-मेल
mehta.neerja24@gmail.com

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