पाँच मुक्तक (सुरेन्द्र साधक)

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पाँच मुक्तक (सुरेन्द्र साधक)

1)
बहुत पाया बहुत खोया हँसा जी भर बहुत रोया ।
बहुत ज़ागा बहुत सोया, बहुत काटा बहुत बोया ।
कहाँ पर है मेरी गलती..बता ऐ ज़िन्दगी मुझको ।
दिया सिर लाद जो तूने…. वही सामान है ढोया ।

2)
हुआ है बन्द इक काला .. यहाँ क़ुरआन का पन्ना ।
उलेमा मुल्लों के थोपे …… हुये फ़रमान का पन्ना ।
विजय इन्सानियत की ये असल में तो तभी होगी ।
ज़िहादी और होगा बन्द ……जब शैतान का पन्ना ।

3)
नही है एक ही केवल……. सफर में हैं कई राहें !
हुआ क्या गर यँहा तेरी ..जुदा कुछ हो गई राहें !
बदल जाने से राहों के कभी जीवन नही रुकता !
अगर कुछ बन्द होंगी तो खुलेंगी कुछ नईं राहें ।

4)
पड़े जब भी नजर तुझपे ये संयम ड़ोलने लगता ।
तुम्हारी हुस्न का जलवा.मधुर रस घोलने लगता ।
गले से आ लगा लूँ मैं. …तुम्हे ओ रूप की रानी ।
कि तुम मेरी हो बस मेरी ज़िगर ये बोलने लगता।

5)
नश़ीले नयनों की मस्ती .मुस्कुरा-कर पिलाये जा ।
तऱाने छेड़ती धड़कन …..सुरों से सुर मिलाये जा ।
नहीं ये रोज़ आयेंगे ……. प्रिये इज़हार के मौसम ।
मिलाके हाँ में हाँ मेरी चमन दिल का ख़िलाये जा ।

 

सुरेन्द्र साधक,कवि एवं गीतकार,दिल्ली
मो—9899494586

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