सँवरा होगा चाँद by Dr.Purnima Rai

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सँवरा होगा चाँद( गज़ल)

दर्पण में नित छवि देखकर सँवरा होगा चाँद।
प्रिय मिलन की अभिलाषा में निखरा होगा चाँद।।

घूम रहा वह निसदिन देखो भू से अम्बर तक,
यौवन की दहलीज पे ही भटका होगा चाँद।।

गम घटायें छायी जग में रुप बदलता अपना,
मेघ घनेरे देखके नभ में चमका होगा चाँद।।

सेज सजी जब फूलों वाली महका मन आँगन,
तारों की बारात के संग तब सजता होगा चाँद।।

छटा निराली देख चाँद की हो गया मन हर्षित,
स्वार्थ लोभ की पगडंडी पर सँभला होगा चाँद।।

हर पल हर क्षण रुप अलौकिक लगे”पूर्णिमा” अब तो,
जिक्र चला अमावस का जब अटका होगा चाँद।।

डॉ.पूर्णिमा राय,अमृतसर।
drpurnima01.dpr@gmail.com

 

 

 

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