हमारी पीढ़ी ने

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हमारी पीढ़ी ने

हमारी पीढ़ी ने
नहीं लड़ी 
आजादी की लड़ाई
इसलिए
हम नहीं समझ सकते
आजादी की कीमत…
हमने केवल टेक्सट बुक्स 
में परीक्षा के लिए पढ़ें और रटे  हैं
जंग-ए-आजादी की 
कई दर्जन तिथियाँ
हमें नहीं पता
क्या होती है 
लहू से लथपथ
शहादत….
हमने देखे हैं आज के रहनुमाओं को 
 तिरंगा ही तिरंगा
लहराते हुए 
लाल किले से लेकर
सरकारी लाल कोठी तक
….यूनियन जैक को धवस्त 
करने वाले ….तिरंगे को लहराते 
देखने का स्वप्न देखने वाले
कितने भगत सिंह, कितने अशफाक,
कितने बिस्मिल , कितने सुभाष
के जीवन में
आया ही नहीं
कभी पंद्रह अगस्त….
हम हर साल ‘सेलेबरेट’ करते हैं
‘फिफ्टीन आगस्ट’
सुबह सुबह
छुट्टी के दिन वाला
“स्पेशल कॉफी” पी कर
रंगीन पन्नों वाला
अंग्रेजी न्यूज पेपर पढ़कर
न्यूज चैनलों पर
सरकारी कार्यक्रमों 
को लाइव देखकर
..दोपहर में
एड के बीच बीच में
“गाँधी” या “रंग दे बसंती” देखकर
या “बुक माई शो” पर
पाेइंटस् रिडेम्शन कर
मूवी टिकिट खरीदकर
रात में मैकडोनाल्ड या के एफ सी 
में डिनर करके
बैकग्राउंड में म्यूजिक चलता रहता है
” ए मेरे वतन के लोगों, 
जरा याद करो कुर्बानी…”
वाट्स पर सैकड़ों ” हैप्पी इन्डिपेन्डेन्स डे “
के संदेशों को
बिना पढ़े
डिलिट कर
सो जाते हैं
नेहरू के “ट्रिस्ट विथ डेस्टिनी”
की मद्धम मद्धम आवाज
सपने में
गूंजती है.

गौतम कुमार सागर,गुजरात 

प्रबंधक बैंक ऑफ बड़ौदा

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