दिल तो इक बच्चा है

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दिल तो इक बच्चा है

नटखट दिल…! एक बच्चा ही तो है, जो हर घड़ी, हर कदम पर, एक मस्त , मन मौजी , चंचल परिन्दे की भाँति स्वच्छन्द खुले आकाश में नए नए ख़्यालों का पुलंदा लिए अपनी लम्बी- लम्बी उड़ानें भरता रहता है और रच डालता है अपनी ही एक अलग नई दुनियाँ, नया इतिहास तथा नए नए विचारों का ताबूत लिए कूद पड़ता है जीवन रूपी गहरे समुन्दर में, वक्त की पतवार को थामे , लहरों के साथ झूलता , पवन की तरह हिलोरें लेता सागर के अन्तस से समेट लाता है अनमोल रत्न … कुछ हीरे कुछ मोती और बिखेर देता है ज़िन्दगी के कोरे ,साफ-सुथरे पाक दामन पर और वो पाक दामन है हमारा भोला सा ,प्यारा सा मासूम बचपन।

बचपन हम सभी की ज़िन्दगी का वो हिस्सा है जिस पर हमारा, हमारे समाज का, हमारे शहर का , हमारे राज्य का , हमारे देश का व सम्पूर्ण विश्व का भविष्य टिका हुआ है अर्थात आज का हर एक बच्चा कल का उगता हुआ सूरज है तथा शीतलता प्रदान करने वाला चाँद और आकाश गंगा में चमकने वाला सितारा है जो हमारे हीरे मोती रूपी अनमोल संस्कारों के माध्यम से ही सम्भव हो सकता है जिसमें हम सभी माता-पिता और बड़े-बुज़ुर्गों की एक अहम व महत्वपूर्ण भूमिका बनती है कि हम सभी मिलकर अपनी इस नन्हीं अंकुरित होती पौध को प्यार-मुहब्बत, मान-सम्मान, आदर-प्रेम- दयाभाव, त्याग व समर्पण रूपी संस्कारों से सींचें तथा एक अदभुत कल्पना से परे अवर्णनीय कल का अर्थात भविष्य का आगाज़ करें।

आपकी इस नाचीज़ ‘माही’ ने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए अपना पहला कदम सितम्बर 2014 में आपनी बाल साहित्य की पहली पुस्तक “चन्दामामा आओ ना” के स्वरूप में उठाया था । जिसमें बाल मन को मोह लेने वाली, शिक्षाप्रद खेल-खेल में नैतिक ज्ञान प्रदान करने 50 कविताओं को संगठित किया है , जिसे ‘शिशु गीत’ व ‘बाल गीत’ के रूप में विभाजित कर दो स्तम्भों को खड़ा किया गया है , बाल साहित्य रचने का पूरा श्रेय मेरे दो चिरागों को जाता है । देखिये कैसे—

बेटा…. “माँ मुझे ऐसी कविता चाहिए जो आज तक किसी ने ना सुनी हो और प्रतियोगिता में मैं फस्ट आऊँ”

उस वक्त बेटा द्वितीय कक्षा में पढ़ता था , मैंने तब पहली बाल कविता लिखी ‘हम भारत के फूल हैं नन्हें’ । बेटे ने यही कविता अपने स्कूल में सुनाई और फस्ट आया। अब मेरा बेटा 22 साल का है , कम्प्यूटर साइंस इंजीनियर है और हैदराबाद बाद में जॉब करता है तथा सभी संस्कारों का मान रखता है।

तब हुआ था बाल साहित्य का श्री गणेश…फिर कुछ ही दिन बाद मेरी बेटी ने मुझसे बड़े भोले पन से कहा– ”माँ आपने भईया के लिए कविता लिखी वो फस्ट आया । मुझे भी ऐसी ही कविता लिखकर दो , मैं भी फस्ट आऊँ”

तब मेरी बेटी के०जी० क्लास में थी , मैंने तब दूसरी बाल कविता लिखी ” चन्दामामा आओ ना” । बेटी ने कविता स्कूल में सुनाई और घर आकर खुशी से झूमती हुई बोली….मैं भी फस्ट आई और इसी कविता के नाम पर पुस्तक का नामकरण हुआ। आज मेरी बेटी 19 साल की है और दिल्ली विश्वविद्यालय कॉलेज ऑफ आर्ट से BFA कर रही है। मेरे दोनों बच्चे अपनी इस माँ का पूरा मान सम्मान करते हैं । मेरे दोनों चिराग मेरी दो भुजाएँ हैं ।

दोस्तो ऐसे शुरू हुआ बाल साहित्य रचने का सिलसिला शुरू और फिर एक के बाद एक अनमोल मोती स्वरूप कविता अपने बाल साहित्य रूपी धागे में पिरोती गयी और आप सभी समर्पित की अपनी पुस्तक “चन्दामामा आओ ना” जो एक से पाँच साल तक के बच्चों के लिए उपयुक्त है तथा बच्चों के हृदय में संस्कारों की नींव रखने में सक्षम है। बाल मन बड़ा ही कोमल और पाक होता है ये जिस तरह के वातावरण व संस्कारों के बीच पनपता है वही स्वरूप ले लेता है।

अब बाल साहित्य के आँगन में मैं अपना दूसरा कदम बढ़ाने जा रही हूँ और बालपन के लिए पुनः “बाल गीतिका” व ”खुली बाल कविता” दो स्तम्भ और 40 नई ज्ञानवर्धक कविताओं सहित अपनी एक और पुस्तक ”माँ के चरण दबाता हूँ मैं” के स्वरूप में आज की इस नई पौध अर्थात मासूम नई पीढ़ी को समर्पित है।

बाल साहित्य के चारों स्तम्भ ( प्रेम , सम्मान , दया व समर्पण ) संस्कारों के प्रतीक हैं । कविता रूपी ये अनमोल मोती बच्चों के बालपन के कच्चे मन में सदा के लिए समाहित हो जायेंगे और ज़िन्दगी के हर मोड़ पर एक कवच बन रक्षा करेंगे, बच्चों को प्रेरणा व नयी दिशा मिलेगी और इस समाज का एक नया ही स्वरूप होगा।

बाल साहित्य की मेरी दोनों पुस्तकें “चन्दामामा आओ ना” तथा ”माँ के चरण दबाता हूँ मैं” चार स्तम्भों के स्वरूप में आज की इस नई पौध के लिए एक अनमोल वरदान साबित होंगी ऐसा हमें पूर्ण विश्वास है।

शुभकामनाओं सहित नन्हें चिरागों समर्पित

डॉ.प्रतिभा माही ‘

डॉ० प्रतिभा ‘माही’ 
8800117246

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