माँ तुम क्या हो

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माँ तुम क्या हो
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माँ तुम क्या हो?
माँ तुम क्या नहीं हो?
बरसात की फुहार हो
रिमझिम बरखा हो
घने बादल हो
मेरे लिए तो
नम आखों की शुरुआत हो
तुम्हें देखते ही
मन का सावन झूम उठता है
तुम्हें खुश देख कर
मन मयूर झूम उठता है
माँ तुम मेरे आँगन
की बगिया हो
मैं तुम्हारे बगिया की
बस खर पतवार हूँ
तुम हो तो में हूँ
तुम नहीं तो में क्या हूँ?
तुम्हारी भूली बिसरी
यादों में मैं हूँ न ?
यह मेरे लिए क्या कम है

माँ तुम्हारी लोरियाँ
मुझे सपने में
अक्सर सुनाई देती हैं
सो लेता हूँ नीद भर
जब भी तुम्हारी
मधुर सम्मोहित करने वाली
कुछ आवाज सुन लेता हूँ यादों का क्या जब भी
कहीं भी किसी भी समय
आ जाती है

बस तब किसी सुनसां से
कोने में जाकर
दुनिया से छिपकर
थोड़ा रो लेता हूँ।

सुधीर सिंह सुधाकर
राष्ट्रीय संयोजक
मगसम
भारतवर्ष

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