जिंदगी का दौर

0
94
गज़ल
जिंदगी का दौर कैसा चल रहा,
आदमी ही आदमी से जल रहा।
होड़ की इस दौड़ के टकराव में,
नफरतों का बीज दिल में पल रहा
मिल रहा धोखा यहां ना ओर से,
गैर से ज्यादा करीबी छल रहा।।
बढ़ रही सब के दिलों में दूरियां,
नौजवानों को बुढ़ापा खल रहा।।
चार दिन की है जहाँ में जिंदगी,
जानकर भी ये हकीकत टल रहा।।
लूटकर दौलत जहाँ की उम्र भर,
आज भी वो हाथ खाली मल रहा।।
वक्त के अंदाज पर यूँ ना मचल,
ना रहेगा आज जिसका कल रहा।।
जोश मेंआता सवेरे नित मगर,
साँझ होते ही दिवाकर ढल रहा।।

प्रमोद सनाढ्य”प्रमोद”
नाथद्वारा

Loading...
SHARE
Previous articleउम्मीद
Next articleमैं भारत हूँ
अचिन्त साहित्य (बेहतर से बेहतरीन की ओर बढ़ते कदम) यह वेबसाईट हिन्दी साहित्य--गद्य एवं पद्य ,छंदबद्ध एवं छंदमुक्त ,सभी प्रकार की साहित्यिक रचनाओं का रसास्वादन करवाने के साथ-साथ,प्रत्येक वर्ग --(बाल ,युवा एवं वृद्ध ) के पाठकों के हिन्दी ज्ञान को समृद्ध करने एवं उनकी साहित्यिक जिज्ञासा का शमन करने हेतु प्रयासरत है। हिन्दी भाषा,साहित्य एवं संस्कृति के विपुल एवं अक्षुण्ण भंडार में अपना साहित्यिक योगदान डालने,समाज एवं साहित्य के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह करने हेतु यह वेबसाईट प्रतिबद्ध है। साहित्य,समाज और शिक्षा पर केन्द्रित इस वेबसाईट का लक्ष्य निस्वार्थ हिन्दी साहित्य सेवा है। डॉ.पूर्णिमा राय, शिक्षिका एवं लेखिका, अमृतसर(पंजाब)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here