मीनाक्षी मेहराः बेटी स्वयं राखी (राखी और आज़ादी,विशेषांक-अगस्त 2017)

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मीनाक्षी मेहराः बेटी स्वयं राखी

राखी अर्थात् जो रक्षा करे!जिसे भेजी यां बाँधी,उसे बहनों द्वारा अपनी रक्षा का दायित्व देने की यह रस्म ,यह परंपरा उस दायित्व,भार को वहन करने, निभाने में सक्षम नही रही लगती।आखिर कब तक भारतीय महिलायें उस गुलामी की मानसिकता को पुष्ट करने की विरासत कै ढोती रहेंगी जहाँ उन्हें केवल पुरुष की आश्रिता के रुट में ही चिन्हित किया जाता है– चाहे वह पति हो ,चाहे पिता,यां फिर भाई!!

शक्तिपुँज कहलाई जाने वाली नारी अपधी रक्षा का भार क्यों किसी पर डाले।आज नारी जीवन के हर कोने को अपनी प्रतिभा से प्रकाशित कर रही है तो फिर क्यों स्वयं के जीवन के अंधेरे को हरने के लिये समाज उसे प्रेरित नहीं करता।

राखी का पर्व यदि भाई बहन के प्रेम के सुदृढ़ मानक के रुप में स्वीकार किया जाये तो यह उत्सव सही मायनों में 21वीं सदी के श्रेष्ठ उत्सवों की श्रेणी में आने योग्य बनता है।

लिंग भेद की कुरीति कहीं गहरे में इन त्योहारों की आड़ में भ्रूण हत्या को बढ़ावा देती है।महिलाओं पर तानकशी होती है उनमें असुक्षा की भावना बढ़ती है।
बढ़ते हुये वृद्धाश्रम समाज का आईना है जो चिल्ला चिल्ला कर कहते हैं कि कहाँ हैं वे होनहार ..जिनको पैदा करने के लिये कई माताओं ने बेटियों को कोख में रखने से मना कर दिया।

हमारे संस्कारों में ही अवश्य कैई कमी रह गई होगी जो पुत्र आज अपने माता पिता को उनके बनाये घरों में.ही रहने नहीं देते ,ऐसे पुत्र अच्छे भाई साबित होंगे.???..क्या कहा जा सकता !!क्यों न हम बेटियों को संपूर्णता में स्वतंत्रता देकर जीवन जीने योग्य बनाने.के साथ साथ समाज को नये आयाम देने के योग्य बनायें। हर बेटी स्वयं एक राखी है।माता पिता स्वयं इस बेटी रूपी राखी के पवित्र बंधन में बँधें।खुद भी जियें,फले फूलें और बेटी के भविष्य को सुरक्षित करने के स्थान पर उसे एक सुरक्षा कवच बनायें।आऐ मिलकर राखी का त्योहार मनायें।ईश्वर प्रदत्त राखियों को सहारें,सँवारें और सक्षम बनायें।

मीनाक्षी मेहरा,अमृतसर
9023911011

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