जियाउल हक:उपहार(राखी और आज़ादी,विशेषांक-अगस्त 2017)

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जियाउल हक:उपहार(लघुकथा)

राखियों की दुकान लाईन से सजी हुई थी। वहाँ पर मौजूद लोग अपने बच्चों के लिए रंग-बिरंगी राखियाँ खरीद रहे थे। वहीं राखियों के बाज़ार में एक दस साल की छोटी बच्ची पीठ पर एक कबाड़ की बोरी टांगी दुकानों के सामने से कई बार गुजर चुकी थी। कबाड़ बीनना तो उसका एक बहाना था। वह तो छोटी बच्ची ललचाई नजरों से बार-बार राखियों को घूर रही कभी इधर कभी उधर आ- जा रही थी। मैं भी अपनी राखीयो की दुकान पर बैठकर उसी बच्ची को देख रहा था। अंत मे अब मुझ से रहा नही गया। मै पूछ बैठा “छोटी, बार-बार आती- जाती हो इधर तो कबाड़ भी नही पड़े है, जो उठाएगी” मेरी बात सुन कर वह बच्ची वही मुँखबन्द सी थम सी गई। मै उसके पास जाकर फिर पूछा “बताओ बेटी, क्या बात है। कुछ चाहिए।” वह सर हिला कर सर निचा कर लिया। अब मै पास जाकर उसका हाथ पकड़ कर अपनी दुकान के पास लाया और बोला “बोल बेटी भूख लगी है, तो मै तुमको अभी खाना खिलाता हूँ।” यह कहते हुए मै अपनी लंच बाक्स खिंचा। पर बच्ची बहुत ही मार्मिक और मासूम स्वर निकाली जो मेरे सिने को चिरता हुआ निकला। “नही चाचा मुझे भुख नही लगी है, मै तो राखिया देख रही थी जब शाम मे मै अपनी यह कबाड़ बेचुंगी तो कौन से रंग वाला राखी खरीद कर साथ ले जाउगी। मेरा एक तीन साल का छोटा भाई है उसी के लिए। पापा एक महीनो से बिमार है तो माँ उनकी देखभाल करेगी तो बाजार तो आएगी नही इसलिए मै राखी पसंद कर रही हूँ।” यह मासूम स्वर मेरे सीने को घायल करने जैसा था। मै बोला “छोटी देखो यह रहा मेरा दुकान तुमको जो राखी पसंद है बोलो मै अभी उसे लिफाफे मे पैकीग कर देता हूँ।” मासूम बच्ची पीठ पर टांगी कबाड़ के बोरे को निचा रख कर चिंता भरी स्वर निकाली “पर चाचा अभी एक भी रुपया नही है शाम मे कबाड़ बेच कर मै कल सुबह ले जाउगी।” मै उसके सर पर हाथ रखते हुए बोला “बेटी कल तो रक्षाबंधन का हि दिन है। मै तुमको उपहार के रूप मे यह राखी दे रहा हूँ ताकी तुम अपनी भाई को प्यार से यह राखी बांधो। मुझे इस प्यारी से बेटी से पैसे नही लेना।” वह यह बात सुनकर बहुत खुश नजर आई तुरंत राखी पसंद की और मै लिफाफे मे पैक कर सौ रुपए का एक नोट उसके हाथ मे थमाते हुए बोला “ले बेटी कल इस पैसे से मिठाई खरीद कर अपने छोटे भाई के साथ तुम भी खा लेना। वह बच्ची मुझे शुक्रिया बोल कर ऐसी कदमो से घर जा रही थी जैसे वह आज हवा मे उड़ रही हो। उसको इतनी बेचैनी हो रही थी की कल के बदले आज ही घर जाकर अपने भाई को राखी बांध दे।


जियाउल हक
जैतपुर सारण बिहार
पिन कोड- 841205
मो- 8128537330
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