अशोक गोयल “पिलखुवा”: रक्षाबंधन(राखी और आज़ादी,विशेषांक-अगस्त 2017)

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अशोक गोयल “पिलखुवा”: रक्षाबंधन(गीत)

आता है प्रतिवर्ष ,चला जाता है यह त्योहार,
मिट न सका है अभी किंतु बहनों पर अत्याचार 
सौ में पिच्चानवे नारियाँ अब भी दु: ख पाती हैं,
मिली कहाँ इज्जत, पीड़ित घर में भी की जाती है,
कहाँ मिटा उनके प्रति नर का भीषण दुर्व्यवहार।
राखी का आमन्त्रण, भाई उठें सामने आएँ,
अन्य भाइयों को माँ- बहनों की गरिमा समझाएँ,
पत्नी की सेवा व त्याग की हो महिमा स्वीकार 
हत्याएँ दहेज के कारण अब भी तो होती हैं
आँसू की धारा से ज्यादा आत्माएँ रोती हैं,
बहनें भी बहनों के दु: ख, को आज भगाएँ मार।
नारी को आदर की नजरो से देखा जाए,
पूजा जैसा विमल भाव उनके प्रति मन में आए,
घर- पडो़स कार्यालय हो यां हो मैत्री- संसार ।

अशोक गोयल पिलखुवा
कवि, लेखक संपादक,समाज सेवी
संपर्क–
अशोक साड़ी भंडार ,उमराव सिंह मार्किट पिलखुवा (हापुड़),पिन 245304 यू०पी०
मो— 09457759878, 09259053955
ईमेल—ashokgoel1985@gmail.com
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