एक कप चाय

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प्रेरक प्रसंग —–राजकुमार’ राज’

1) दुर्जन के संग,दूरी अच्छी

बहुत बार ऐसा होता है कि शरीर के किसी खुले भाग पर कोई छोटा-मोटा ज़ख्म या फिंसी हो जाए तो अचानक कोई मक्खी उस पर बैठना शुरू कर देती है..हम बार-बार उसे उड़ाते है और वह पुनः कुछ क्षण बाद उसी जगह पे आकर बैठती है…हम परेशान हो उठते है और कई बार तो गुस्से में उसपर प्रहार कर बैठते है…लेकिन चोट हमे ही पहुंचती है और वह मक्खी उड़ कर पुनः उसी ज़ख्म पर आ बैठती है…अंततः इसका एक ही समाधान बचता है..वह यह कि हम या तो वह स्थान बदल लेते है या ज़ख्म को कपड़े से ढांप (ढक)देते है..और कुछ पल वह उस कपड़े पर मंडरा कर रुख्सत हो जाती है ।..दोस्तो ! नीच प्रवृति के लोग भी इसी मक्खी की तरह होते हैं ,
वे हमारी किसी कमजोरी को आड़ बनाकर हमारे जीवन में परेशानी पैदा करने का बार-बार प्रयास करते है और हम उन्हें दूर करने की कई कोशिशें करते हैं…कई बार हम परेशान होकर हिंसक भी हो बैठते है ,और नुक्सान उठाते है…लेकिन इसका सबसे उत्तम समाधान है ऐसे लोगों की पूरी तरह नजरअंदाजी..इनकी किसी क्रिया के प्रति कोई प्रतिक्रिया ना देना.. बस कुछ समय बाद यह हमारी ज़िंदगी से अलोप हो जाते हैं।

2) एक कप चाय हो जाए

यह देश दिलवालों का रहा है।हमने पुरातन काल से लेकर ईस्ट इंडिया कंपनी के आने तक सब कुछ दिल से निभाया–चाहे वो लड़ाइयां थी ,इश्क़ था या अध्यात्म ! सब दिल से उठा-मेहमान नवाजी में बड़ा सा दूध का गिलास काढ़नी में से पेश किया जाता था।शायद दूध और दिल का नाता बहुत पवित्र था।सफेदी से भरा,मिठास से भरा,चिकनाई से भरा!
दोस्तो ! माना जाता है कि अंग्रेज भारत में चाय लेकर आए–काली,कड़वी और स्वभाव की खुश्क! भारत में चाय का पहला बगीचा चाबुआ (आसाम) में सन् 1840 में लगाया गया।इस चाय ने हमारे खून में चालाकी दी..दिमाग की खिड़कियां खोली…इतने बड़े-बड़े फैंसले खास सभाओं में चाय की प्याली हाथ में लिए चुस्कियां भर-भर कर होने लगे और यह रिवायत बादस्तूर जारी है।आज भी हमारी ज़िन्दगी की सभी आम या खास मुलाकातें चाय की चुस्कियों में परवान चढ़ती हैं।इनमें दिल बहुत कम और दिमाग बहुत अधिक उपस्थित होता है लेकिन इस चाय से छुटकारा मुश्किल है..क्योंकि हिन्दोस्तान जागता ही चाय की प्याली से है….” एक कठिन जीवन में हर रोज प्रवेश करने के लिए!

3) दुनिया एक मुसाफिरखाना

ज़िन्दगी का सफर अति अचेतनता ( बेहोशी )में अंधकूप से निकलकर रोशनी से भरे हुए जहान में शुरू होता है और इस सफर का अंत अति चेतनता ( होश ) में उसी अंधकूप में समाकर समाप्त होता है..आखिर अंधकार से निकला जीवात्मा उसी गहरे अंधकार में क्यों समाता है ?..क्या यह अंत रोशनी से भरे किसी दूसरे जहां से नही जुड़ सकता ?…..हे आत्मन ! राहें रोशन होती हैं…जहाँ भी मौका मिले कोई दिया जलाता जा–नेकी का ,प्रेम का ,त्याग और विश्वास का!यही दिये तब जल उठेंगे ,जब वो काली रात आएगी..जिससे हज़ारों बार डर-डर के गुजरे हो…केवल यही एक साधना सूत्र है जो जीवन के सफर के अंतिम पड़ाव को प्रकाश से भर देता है और कोई विदा होता हुआ राही मुस्कुराता हुआ अति शांति से आंखों के दरवाजे बंद करके चला जाता है।

4) सूटकेस

दोस्तो ! कभी सूटकेस देखा है आपने –कपड़ों से भरा हुआ।अक्सर हम सब सफर पे जाने से पहले इसे तैयार करते है।बड़ा दिमाग लड़ाकर इसमें ज्यादा से ज्यादा स्थान बनाकर तौलिया और दूसरे वस्त्र सहेज कर रखते हैं।और फिर बंद करते है ।जीवन भी ऐसा ही है ..(खासकर हमारा खुद का अति मानव-भीड़ से भरा हुआ यह भारतवर्ष..)इस दुनिया में छोटे से छोटे वर्ग से लेकर बड़े से बड़े समुदाय में पहले से मौजूद लोग एक सूटकेस में भरे कपड़ों जैसे है।यह तो हमारी काबलियत और बुद्धिमता पर निर्भर करता है कि हमें कैसे उनमें एक स्थान बनाकर खुद को स्थापित करना है —संघर्ष बुद्धिमता से सार्थकता को पाता है ।

5) बुल्ला हो जा ,बुल्ले लग जा

पतंगबाजी में कई बार कटी हुई पतंग अचानक ज़मीन पर गिरने के स्थान पर ऊपर उठने लगती है और अद्भुत तरीके से ऊँची उठकर नभ को छूने लगती है,पंजाबी में इसे पतंग को बुल्ले की हवा लगना कहते हैं।
हे आत्मन ! ध्यान का मार्ग बहुत विचित्र है।अथाह अंधेरों में से निकल कर आप कई बार अनन्त प्रकाश से नहा उठते हो।यह साधक की ज़िंदगी में एक सौभाग्यशाली घटना होती है।ध्यान में केवल एक समर्पण होता है ,विचारविहीन समर्पण!दुनिया से ही नही खुद से भी कटना पड़ता है,तब वह क्षण जरूर आता है,जब हम उसकी गोद मे समाए होते हैं जो हमारे वजूद का सबसे बड़ा सत्य है।

राजकुमार ‘राज’

स स स स्कूल ,बल कलां,अमृतसर

 

 

 

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