हाँ,स्त्री हूँ मैं (कविता)

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हाँ…स्त्री हूँ मैं !
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हाँ ! स्त्री हूँ मैं !
और स्त्री होना ही एक बड़ी चुनौती है अपने आप में !
चुनौती है – समाज में खड़े रहने की !
चुनौती है -भेडियों से बचे रहने की !
चुनौती है – अपना चेहरा तलाशने की !
चुनौती है -अपनी उड़ान नापने की !

हाँ !स्त्री हूँ मैं !
इसीलिये , सम्भालती हूँ घर  !
चुराती हूँ कुछ लम्हे
अपने लिये भी !
चुनती हूँ चावल ,
बुनती हूँ सपने !
हाथ चलते हैं बाहर !
भीतर चलती हूँ मैं !
कभी गर्म तवे पर सिकती रोटियों के बीच से कुछ वक्त चुरा लेती हूँ !
कभी गुपचुप ख्वाहिशों की बारिशों में
नहा लेती हूँ !
टुकडा -टुकड़ा खुद को काटती हूँ !
खुद को ऑफिस और घर के बीच बांटती हूँ !
बचपन से बुढ़ापे तक
संघर्ष का सफ़र करती हूँ !
हर रोज़ मुश्किलों के भँवर में
डूबती हूँ ,
फ़िर उबरती हूँ !
याद है मुझे वो दिन भी –
जब –
भाई रौँदता था वक़्त
फर्राटे से भागती मोटर साइकिल के
तेज़ पहियों तले ,
तब –
बचाती थी मैं तिनका -तिनका समय –
अपनी नींदे काटकर !
मुँह अँधेरे
चुपके से जागकर !
स्त्री हूँ मैं !
मालूम है मुझे ,
मर्यादाओं
की हजारों -हज़ार नज़रें
मेरा पीछा करती हैं !
सी.सी.टी.वी.की तरह
हर पल मुझ पर नज़र रखती हैं !
मगर !
स्त्री हूँ मैं !
हर परीक्षा में खरी उतर आऊंगी !
टूकड़ा -टुकड़ा बंटकर भी ,
अपना वजूद सिद्ध कर जाऊँगी ।


(डॉ.शशि जोशी “शशी “,अल्मोडा
उत्तराखंड )

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