जिम्मेदारी

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जिम्मेदारी (लघुकथा)

आठ वर्ष की नीलू की किलकारियो की आवाज घर के कोने कोने से आ रही थी । प्यारी सी चिड़ीयाँ की तरह चहक रही थी । सभी उसे खुश देख कर बेहद खुश हो रहे थे । पर इनसब के बीच वो एक क्षण के लिए भी अपने पिता को अकेला नहीं छोड़ रही थी । अब इसे उस मासूम का बालपन कहे या उसके मन का डर पर फौजी पिता उसकी इस मासूमयित को भलीभांती समझ रहे थे । यहीं वजह थी कि एक महिने की छुट्टी में वो अपना हर पल बिटियाँ और परिवार के संग जी रहे थे ।
“पापा ,पापा ” चलिए ना मेरे दोस्तों के घर बोलने पार्टी में आने को फिर हमें केक भी तो लेने जाना हैं उसके बाद आपसे तोहफा भी तो लेना हैं । तमाम व्यस्ताओं के बीच भीषम गर्मी में भी वो पसीना पोछते मुस्कुरा दिये ।
” हाँ हाँ चलते हैं , चलते हैं ” मेरी गुड़िया का ही दिन हैं आज हुकूम तो मानना ही पड़ेगा बोलो क्या चाहिए मेरी राजकुमारी को । पापा मुझे एक रस्सी चाहिए । सुन सब हतप्रभ रह गये ।
“क्यों” क्या करोगी उसका । आपको बाँधकर रखूंगी ताकि आप हमसब को छोड़कर ना जा सको । बड़ी मुश्किल से रोक पाया आँसू सुधीर मूक बन गया क्योंकि क्या और कैसे समझाता उस छोटी बच्ची को!
उसी वक्त फोन की घंटी बजी । जाने किसका फोन था बस ” यस सर ” बोल फोन रख दिया । आता हूँ कहकर तुरंत जाने कहा निकल पड़ा सुधीर । थोड़ी देर बाद जब आया तो उसके हाथ में एक छोटा सा पौधा और केक था । जिसे देख नीलू ने पूछा ये क्यों पापा ।
बेटे ये आपके जन्मदिन का तोहफा हैं जो आज मैं आपको दे रहा हूँ । अब आप इतनी तो बड़ी हो ही गयी हो कि आप इसका ख्याल रख सको जैसे आपके पापा मम्मी आपका रखते हैं ।
पता हैं किसका फोन था सरहद से वहाँ मुझे जाना हैं अपनी जिम्मेदारी निभाने देश और देशवासियों की रक्षा के लिए ।
आपको भी अपनी जिम्मेदारी निभानी हैं दो दो जिम्मेदारी ।
” दो दो वो क्या पापा ” ??
एक आपको इस पौधे का ख्याल रखना हैं एक मेरी बिटिया का और उसकी पढ़ाई का ताकि आप अपनी पढ़ाई से इस पौधे की जड़ों को तरह खुद को मजबूत कर सको ताकि अपना और अपने देश का नाम रोशन कर सको ।
बोलो निभाओगी ना जिम्मेदारी ??
हाँ पापा मैं हर जिम्मेदारी निभाऊंगी !
चलो अब केक काटे ।
बोझिल मन से केक तो काटा पर मन में पिता की दी जिम्मेदारी का उमंग भी था संग । पापा आप जाओ मैं सब सम्भाल लूंगी ।
मासूम की इस मासूमियत पर निहाल हुआ सुधीर उसके ललाट को चूम सीने से भींच बस इतना ही कह पाया ” मेरी प्यारी गुड़ियाँ अगले साल मैं जरुर वक्त निकालूंगा तेरे लिए ” इस बार मुझे जाने दे मैं मजबूर हूँ अपने फर्ज के आगे । मेरा प्यार इस पौधें के रुप सदा हर पल तेरे संग रहेगा जो तुझे मेरी याद दिलाता रहेगा ।

रुबी प्रसाद,सिलीगुड़ी

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2 COMMENTS

  1. वात्सल्य और देशभक्ति के द्वंद्व को रेखांकित करती एक सैनिक के कर्तव्य बोध की सुंदर भावाभव्यक्ति।प्रभावी लघुकथा हेतु रूबी जी को बधाई।

  2. बहुत ही मार्मिक लघु कथा । रूबी जी को बधाई। सुरेन्द्र वर्मा।

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