मखमली स्पर्श

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मखमली स्पर्श

बूंदे छम छम
घन घम घम
चहुँ दिशि
उधम उधम

खिड़की से झाँक कर
हवा के झोंके को
खुद में समेट लेने की
नाकाम कोशिश।

चमेली से उठती
महक ने मन
आनन्दित कर दिया था
मैं लम्बी लम्बी
साँस भरने लगी थी
गोया एक
जानी पहचानी सी महक ही संचित पूँजी थी।

साँपों ने केंचुली
उतार फेंकी थीं
एकदम अहसास हुआ
अतीत रूपी केंचुली को
एक झटके से
उतार फेंकना चाहिये

झींगुर, मेंढक
की आवाज़ें भी
फ़िज़ा में गूँज रहीं थीं

क़स्बे के पेड़ों पर
झूले पड़े हुए थे।
औरतें पाँव जोड़ी मिलाकर
पींगे बढ़ा रहीं थी।
गीत गाते हुए
कच्चे नीम की निबोली
सावन जल्दी आइयो रे..

घर घर से मीठी ,
दाल भरी पूरियों
की खुश्बू आ रही थी।
बूँद के धरा पर गिरते ही
जो सोंधी महक
फूट रही थी कोरी कोरी
उसका तो कोई
जोड़ ही ना था।

बारिश की बूँदों के
मखमली स्पर्श ने
तन मन में सिरहन सी
पैदा कर दी थी।
आकाश में निकले
इंद्र धनुष ने
सतरंगी सपने सजाने
का सन्देश
सकल व्योम पर
छिटका दिया था।

क़ायनात सहेली
बनी जा रही थी
मैं आनायास ही अनदेखे ,अनजाने
क्षितिज पर
विचार तरुवर संग
विचरते हुए मुस्करा रही थीं।

दामिनी की कड़क ने
तन्द्रा भंग की
पास में खड़ी माँ
मेरे चेहरे पर
छाये इंद्र धनुषी रंगों
को पढ़ रहीं थीं,
कह उठीं—
आज ख्यालों में ही कविता लिख रही हो
खड़ी खड़ी,
सहसा हम दोनों
का बेसाख़्ता
क़हक़हा गूँज उठा,
लगा सारी फ़िज़ा
हमारे साथ हँस रही है।।

डॉ.यासमीन ख़ान,मेरठ

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