आ गया हमको( गज़ल)by Dr.Purnima Rai

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आ गया हमको (गज़ल)

हुई दस्तक बहारों की निखरना आ गया हमको।
चली पतझड़ हवायें जब सिमटना आ गया हमको।।

तुम्हारी बेरुखी को ही कभी हम जीत ना पाये,
जगत के घात-प्रतिघातों से लड़ना आ गया हमको।।

हवायें चल पड़ें विपरीत फिर भी हम न घबराते ,
खिलाफत करने वालों को कुचलना आ गया हमको।।

हमेशा बात को अपनी घुमाते लोग क्यों जग में,
हुये चर्चे फिजाओं में समझना आ गया हमको।।

बहुत ही लड़खड़ाते पाँव जब विपदा घनी आये,
अपाहिज पर पड़ी नजरें सँभलना आ गया हमको।।

कमी औरों की ही देखी न देखी खूबियाँ हमने,
किसी का आसरा बनके सुधरना आ गया हमको।।

चमन की लूटकर खुशियाँ कभी आँगन नहीं फलते,
दिखाकर “पूर्णिमा” नभ में चमकना आ गया हमको।।

विशेष –बह्र– 1222 1222 1222 1222
काफिया—अना//रदीफ—–आ गया हमको

Dr.Purnima Rai,Asr

डॉ.पूर्णिमा राय,अमृतसर।
drpurnima01.dpr@gmail.com

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