महानगर में दादी(नवगीत)

2
198

एक नवगीत —
…………..
महानगर में दादी
———————-
तुलसी चौरा ढूँढ रही हैं
महानगर में दादी

घर है या मुर्गी का दड़बा
छत दालान न आँगन
कहाँ अरघ दें
सूर्यदेव को
कहाँ रखें अग्रासन
कहाँ विराजेंगे ठाकुर जी
पूजा होगी कैसे
ये सवाल दादी के मन में
उठते हैं रह रह के
जैसे तैसे दादी जी ने
खुदको समझाया है
क्या मलाल मन में करना है
सब प्रभु की माया है
फिर भी अकसर
दिल में उनके
हूक उठा करती है
ओसारे में खड़े नीम की
जब जब याद सताती।

बेटे बहू चले जाते हैं
बड़े भोर से ऑफिस
साँझ ढले तक ही दोनों
आ पाते हैं घर वापिस
चार साल के पोते को
दादी कब तक बहलाएँ
अजब गजब जिद
उसकी दिन भर
पूरी न कर पाएँ
दादी के हाथों का उसको
हलवा तक न भाता
जिद्दी बच्चा रोते रोते
भूखा ही सो जाता
सारे घर में करता है तब
भाँय भाँय सन्नाटा।
सन्नाटे में दादी की
तबियत बेहद घबराती।

डॉ.शिवजी श्रीवास्तव

19 जनवरी 1955 को झाँसी में जन्म।श्री चित्रगुप्त महाविद्यालय मैनपुरी से हिंदी प्राध्यापक के पद से सेवानिवृत्त। हिंदी की अनेक विधाओं में लेखन।अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिताओं में 3 कहानियाँ पुरस्कृत।आकाशवाणी द्वारा आयोजित सर्वभाषा अखिल भारतीय रेडियो नाट्य लेखन में हिंदी नाटक हेतु पुरस्कृत।अनेक पत्र पत्रिकाओं में कहानी, कविता,नवगीत,आलोचना इत्यादि प्रकाशित।एक कहानी संग्रह यक्ष प्रश्न प्रकाशित।

Loading...
SHARE
Previous articleदिल बंजारा
Next articleआ गया हमको( गज़ल)by Dr.Purnima Rai
अचिन्त साहित्य (बेहतर से बेहतरीन की ओर बढ़ते कदम) यह वेबसाईट हिन्दी साहित्य--गद्य एवं पद्य ,छंदबद्ध एवं छंदमुक्त ,सभी प्रकार की साहित्यिक रचनाओं का रसास्वादन करवाने के साथ-साथ,प्रत्येक वर्ग --(बाल ,युवा एवं वृद्ध ) के पाठकों के हिन्दी ज्ञान को समृद्ध करने एवं उनकी साहित्यिक जिज्ञासा का शमन करने हेतु प्रयासरत है। हिन्दी भाषा,साहित्य एवं संस्कृति के विपुल एवं अक्षुण्ण भंडार में अपना साहित्यिक योगदान डालने,समाज एवं साहित्य के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह करने हेतु यह वेबसाईट प्रतिबद्ध है। साहित्य,समाज और शिक्षा पर केन्द्रित इस वेबसाईट का लक्ष्य निस्वार्थ हिन्दी साहित्य सेवा है। डॉ.पूर्णिमा राय, शिक्षिका एवं लेखिका, अमृतसर(पंजाब)

2 COMMENTS

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here