दिल बंजारा

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दिल बंजारा’

ऐ- मेरे दिल कहाँ तेरी मन्ज़िल
ज़िद्दी बंजारे
घूमे क्यों नगर-नगर
डगर-डगर ,द्वारे-द्वारे
रूप धरे सो तरह
बढ़ाता क्यों निज विरह
तेरे मन में कौन बसा रे!

दुनिया मुझे कहे अजीब,
अनोखी,
हर अदा क़ातिल
भरी शोख़ी
तू मुझसे भी अनुपम मिला रे!
जब भाग- भाग
और जाग-जाग थक जाये जग में
तब पता लगेगा,
तेरा ही ध्यान मीरा ने धरा रे!

जब लगे लगन,
सुलगे तन मन
पीड़ा हो सघन
बेझिझक लौट तू आ रे!
तू दबंग इंद्र कुमार,
चमेली की मैं कोमल डार
पहना दूँ तुझे प्रेम हार
अप्सरा से फंदा छुड़ा रे!
यूँ तो न अब बिसरा रे!
ओ बाज़ीगर कर खेल इधर
अब है तन जर-जर
रस लोभी सुधर
प्रेम तान कोई तो सुना रे!
किस नाच में मन तेरा रमा रे!


डॉ.यासमीन ख़ान,मेरठ

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1 COMMENT

  1. बहुत खूबसूरत ढंग से अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त किया आपने यास्मीन जी!!बधाई

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